सपना

कल रात फिर एक सपना देखा मैंने,
चांदनी  रात में तुम चुपके से आयीं मेरे पास,
हम दोनों के बीच न ज़माने कि दूरी थी,
न कोई मजबूरी..
खुश थें हम अपने उस सपनों कि दुनिया में,
जहाँ हर तरफ खुशियों के चिराग जगमगा रहे थे…
एक दुसरे को बस हम देखे जा रहे थे,
अलफ़ाज़ हमारे आखों से बयां हो रहे थे..
समंदर से तो मैं वाकिफ हूँ,
लेकिन वो आँखें कुछ ज्यादा गहरी हैं,
जिनमे मैं डूब जाया करता हूँ..
कल सपने में न जाने कितनी बार,
उन आँखों में डूब के वापस आया था मैं…
पर,
खुली जो आँख तो न तुम थी,
न वो ज़माना ,
और न वो सपना…
दहकती आग थी, तन्हाई थी और मैं था..
उस हसीं सपने कि शायद,
सच होने कि कोई गुंजाइश नहीं..

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

11 COMMENTS

  1. क्या कमाल लिखा है अभि…इतनी सादगी और सहजता से कितना कुछ कह गए…दिल को छू गई…

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