किताबो में भी तुम

अभी शाम में बैठे बैठे ऐसे ही लिखा..

किताब लिए बैठा हूँ शाम से मगर,
एक चेहरा मुझे पढने नहीं दे रहा ..
वो तुम ही हो..
तुम्हारा ही अक्स बना हुआ है हर पन्ने पे..

अभी एक पन्ना पलटते ही,
वो गुलाब मिला..
जो तुमने मुझे दिया था कभी…
इसके पंखुरियों पे ,
ना जाने कितने मेरे आंसू है गिरे हुए..
इन किताबों के हर पन्ने
क्यों तुम्हारी याद दिलाते हैं?

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.
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