तुम जा रही थी

तुम जा रही थी..
स्टेशन के प्लेटफोर्म नंबर वन के
एक कोने में खड़ा,
मैं बस तुम्हें देखे जा रहा था..
जिंदगी फिसली जा रही थी आँखों के सामने मेरे..
बेबस खड़ा मैं,
बस देखे जा रहा था..
उसी रुमाल से,
जिसे तुमने दिया था कभी
अपनी आँखों के आंसू पोछ रहा था..
दिल में एक अजीब सा दर्द उठा उस वक्त..
जब तुम्हारे चेहरे पर नज़र गयी थी मेरी
तुम्हारा वो खिला चेहरा,
उस दिन खिला खिला नहीं लग रहा था मुझे
उदासी साफ़ झलक रही थी चेहरे पर तुम्हारी..
और बेबस खड़ा मैं
बस तुम्हें देखे जा रहा था…

एक शाम पहले
जब तुमसे आखरी बार मिलकर,
घर वापस आया था..
एक अजीब सी बेचैनी थी..
एक अजीब सी उदासी थी…
तुमने उस शाम
जो ग्रीटिंग्स कार्ड दिया था,
उसे हाथों में लेकर घंटों बैठा रहा
उस ग्रीटिंग्स कार्ड में रखे वो दो फूल
जिनमें तुम्हारे हाथों का स्पर्श था
और जिसे मैं महसूस कर रहा था
रात भर उन्हें हाथों में लेकर
जागा रहा था मैं
शाम की तुम्हारी बातों को
तुम्हारी शरारतों को
तुम्हारी मुस्कुराहटों को
याद करते हुए
कब सुबह हुई पता ही नहीं चला था.

सच में,
वो शाम
जब हम आखिरी बार मिले थे,
कितनी छोटी थी,
कितनी जल्दी बीत गयी थी…
कितनी बातें थी मन में,
जो तुमसे कहना चाहता था,
लेकिन वक़्त कहाँ था हमारे पास,
वो सारी बातें
जो अनकही रह गईं,
अब तक कचोटती हैं मन को

उसी शाम चलते चलते,
तुमने अचानक मेरा हाथ थाम लिया था
और कहा था मुझसे,
तुम उदास न होना, मैं वापस जल्दी आऊंगी…
ग्रीटिंग्स कार्ड में भी तुमने,
यही लिखा था..
और साथ में लिखा था तुमनें,
तुम्हारी मुस्कराहट मेरी अमानत है,
सम्हाल कर रखना इसे,
और हमेशा मुस्कुराते रहना.

उस शाम जब तुम जाने लगी थी…
एक पल सोचा रोक लूँ तुम्हे,
जो वादा उस शाम किया था तुमसे
तोड़ दूँ उसे
तुम्हारा हाथ थाम,कहीं दूर चल दूँ,
इस ज़माने से बहुत दूर कहीं,
जहाँ सिर्फ तुम और मैं हों..
और दूर दूर तक कोई न हो
पर मैं कमज़ोर था..
ये कर न सका..

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

18 COMMENTS

  1. उस दिन भी जब तुम जा रही थी,
    अच्छा तो बिलकुल नहीं लग रहा था..
    एक पल सोचा की रोक लूँ आके तुम्हें
    हाथ थाम अपने साथ कहीं ले चलूँ,
    इस ज़माने से कहीं बहुत दूर..
    पर मैं कमज़ोर था..ये कर न सका..

    वाह …भीगते मन की सुन्दर अभिव्यक्ति ….शुरू से अंत तक बढ़िया
    http://athaah.blogspot.com/

  2. बहुते बढिया एक्स्प्रेसन है, एही से हम कभी किसी को सी ऑफ करने इस्टेसन नहीं जाते हैं… एकाध गो सुझाव दे रहे हैं..देखना हो सके तो ट्राई करो..अच्छा लगेगा अईसा हमरा सोचना है –

    1.दिल में एक अजब सा दर्द उठा उस वक्त..
    यहाँ पर “अजब” को “अजीब” लिखना चाहिए
    2. और मैं बेबस खड़ा एक कोने में तुम्हें बस देखे जा रहा था…
    और बेबस खड़ा मैं, एक कोने में, बस तुम्हें देखे जा रहा था…

    जो साहस तुम नहीं कर सके… ऊ साहस नहीं करने के कारण एगो अदमी का पूरा जिनगी बदल गया… दिल का फैसला दुनियादारी से नहीं होता है…

  3. बहुत ही अच्छा लिखा है अभिषेक! लगता है किसी का जाना सच में तुम्हे बेबस कर गया….!!

  4. चाचा जी,
    आप जो भी कहे बिलकुल वैसा ही कर दिए हैं 🙂
    ऐसे ही हमें सुझाव देते रहिये और अपना आशीर्वाद बनाये रखिये हमारे ऊपर… 🙂

    मैंने ऐसा बहुत लिख रखा है लेकिन पहले बस इसलिए पोस्ट नहीं करता था की मुझे लगता था, मेरा लिखा हुआ कौन पढ़ेगा..इसलिए अब भी कुछ पोस्ट करने में थोडा संकोच होता है 🙂

  5. @स्तुति..
    हाँ बिलकुल..कभी विस्तार से बताऊंगा बाद में..
    @राजेन्द्र जी,
    शुक्रिया 🙂

  6. अभिषेक !
    मैं समझ सकती हूँ! बहुत सुन्दर लिखा है.. मेरा तो हर आशीर्वाद तुम्हारे साथ ही है, ये तो तुम्हे भी पता है न !
    उसे पढ़ाऊंगी जरूर..उसे पसंद आएगा !

    🙂

  7. अभिषेक बचवा!! एगो पादरी Cardinal Newman का कहा है कि
    A man would do nothing, if he waited to do it so well that no one will find fault with what he has done.
    माने, अगर तुम एही इंतज़ार में रहोगे कि लोग गलती निकालेगा त कभी तरक्की नहीं कर सकते.. कबिता त मन का बात ईमानदारी से कह देने का नाम है…बस ध्यान रहे ईमानदारी नहीं छूटना चाहिए.

  8. वो शाम कितनी छोटी थी,
    एक पल में ही गुज़र गयी..
    समय तो मनो,
    पंख लगा के उड़ रहा था उस शाम..

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया… बहुत सुंदर ….रचना….

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