कुछ सपने कभी सच नहीं होते

ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूं  
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
– उबैदुल्लाह ‘अलीम

उस दिन भी ऐसा ही हुआ था.  मानो सब मेरे
आसपास घट रहा हो और मैं वहीं केन्द्र में कहीं हूँ. कौन सी जगह थी
, ये याद नहीं…शायद कोई बड़ा सा मकान था. किसका वो कमरा था ये भी
याद नहीं. लेकिन आँख खुली तो मैं वहां सोया हुआ था
, शायद मेरा ही कमरा था…कुछ अपनी चीज़ें दिख रहीं थी कमरे में. काफी
देर तक शायद मैं सोया रहा हूँगा
, पूरा बदन टूट रहा
था.
शायद किसी की शादी थी.  कुछ ऐसा ही माहौल
था. शायद घरवालों और रिश्तेदारों की फ़ौज अभी तक घर में थी
,  सबकी आवाजें मुझे
सुनाई दे रही थी. माँ की आवाज़
, बहन की आवाज़
साफ़ सुनाई दे रही थी. कहीं कोई किसी बात पर बहस कर रहा है तो कहीं बहनें आपस में
लड़ रही हैं. कहीं कोई कह रहा कि “जाकर सबके लिए चाय बना दो..” तो कहीं
से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थी.
जिस कमरे में मैं हूँ उस कमरे में
जबरदस्त सन्नाटा सा है. मैं चाहता हूँ कि कमरे से बाहर निकलूं
, लेकिन पता नहीं क्यों मैं उठ नहीं पाता हूँ. कमरे के बाहर से आती
हुई आवाजें को मैं सुनने की कोशिश करने लगता हूँ. माँ की आवाज़ है
. वो मेरी बहन से कह रही है “जाकर अपने भैया को उठा दो, शादी हुए अभी एक दिन भी नहीं हुआ और वो इतने देर तक सोया हुआ है? भाभी को ही बोलो जाकर उठा दे”
शादी? भाभी
मेरा सर चकराने सा लगा. मैं समझ ही
नहीं पा रहा था की बात क्या है
? माँ ने मेरी शादी
की बात क्यों की? मुझे क्या हो गया
? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा. कुछ भी याद नहीं आ रहा मुझे. क्यों?? मेरी शादी? किससे?  मुझे कुछ याद
क्यों नहीं आ रहा
? कब से मैं सोया हुआ हूँ? किसी ने मुझे कुछ खिला-पीला दिया है क्या? ये कैसा रहस्य है? मैं सोच ही रहा था कि
दरवाज़ा खुलता है…
उठ गए?
सामने वो खड़ी थी. एक पल के लिए तो
मुझे विश्वास ही नहीं हुआ
.  फिर अगले पल लगा कि
अगर मेरी शादी हुई हो तो इसके अलावा और किससे हो सकती है. वो बेहद खूबसूरत लग रही
थी..
फिरोजी साड़ी पहनें वो खड़ी थी. बाल
उसके अभी तक सूखे नहीं थे
.  भींगे हुए से ही
थे. वो मुस्कुराते हुए
 सामने से गुजर गयी और वार्डरोब में
से कुछ निकालने लगी. कमरे की हर चीज़ को वो एक जगह से उठा दूसरे जगह रख रही
थी…ऐसा लग रहा था कि जैसे पूरे कमरे पर उसी का अधिकार हो. अचानक मेरी नज़र गयी
उसके माथे पर. लाल सिन्दूर उसके माथे पर दमक रहा था..
मैं सोचने लगा कि इस सिन्दूर ने उसकी
सुंदरता कितनी बढ़ा दी है, मैं कहाँ हूँ, वो मेरे सामने कैसे खड़ी है? ये सारा रहस्य
मैं भूल सा गया था, उसे बस देखते रहा था मैं. शायद सिन्दूर में ही ऐसी ताकत ही है
जिससे किसी की भी सुंदरता दुगुनी हो जाती है. बिस्तर पर लेटे हुए मैं उसे देख सोच
रहा था.
इतने में ही दरवाज़ा अचानक फिर से
खुलता है..
कोई रिश्तेदार है. चाचा?मामा? पता नहीं…मैं सिर्फ आवाज़ सुन रहा
हूँ, चेहरा धुंधला सा दिखाई दे रहा है. शायद मामा ही हैं.
कहीं घूमने जाना है क्या आज? मंदिर जाओगी न? ” उन्होंने पुछा.
“हाँ जाना तो है…आज ही…” उसनें जवाब दिया.
ठीक है तो फिर गाड़ी से ही चले जाना और जल्दी वापस आना, कुछ काम भी है.”  इतना कह के वो चले गए. मेरा सर एकदम भारी
सा लगने लगा था. ये क्या हो रहा है? मेरी नज़र फिर से उस पर चली गयी. अब तक वो
चीज़ों को समेट कर रख चुकी थी और मेरे पास आ कर बैठ गयी.
चलिए नहा लीजिए. बहुत देर हो गयी…कितना देर आप सोते रहेंगे?”
चलिए??आप??
वो कब से मेरे लिए इतने सम्मानजनक
शब्दों का प्रयोग करने लगी
??  मैं उससे कुछ कहना चाह रहा हूँ लेकिन कह नहीं पा रहा. जैसे कोई
अदृश्य शक्ति मुझे कुछ कहने से रोक दे रही हो. जैसे मैं बहुत कुछ एक बार में कहना
चाह रहा हूँ और सारे शब्द मुहँ में ही अटक के रह जा रहे हों. मुझे ये सब कोई
छलावा, कोई भ्रम सा लगने लगा है. लेकिन इतने लोग आसपास जमा हैं
, वो मेरे बगल में बैठी है. उसके हाथों की मेहँदी साफ़ दिखाई दे रही
है.. ये सब भ्रम कैसे हो सकता है? मैं उससे कुछ पूछना चाह रहा हूँ. बहुत मुश्किल
से
, पूरी शक्ति लगाने के बाद उससे बस ये
पूछ पाता हूँ “क्या हमारी शादी हो गयी
?”
इस सवाल से वो एक पल खामोश रही, फिर उसकी नज़रें नीची हो गयीं और अपने आप में ही जैसे वो सिमटने
लगी..वो हद शर्माने लगी थी.
  उसकी झुकी नज़रों ने मेरे सवाल का
जवाब दे दिया था. वो कुछ और कहती कि
इतने में ही
दरवाज़ा फिर से खुलता है. इस बार मेरी छोटी बहन है. उसका चेहरा मैं अच्छे से देख
पा रहा हूँ. कोई धुंधलाहट नहीं है..
भैया कब उठोगे? नौ बज गए हैं. भाभी
के आने के बाद हम सब बहन को तो तुम भूल ही गए न…देखो तो कैसे बात कर रहे हो भाभी
से
? और भाभी आपको कोई और नहीं मिला
बतियाने के लिए
, चलिए हम लोग के साथ बैठिये. आपसे कितनी
बातें करनी है हम बहनों को. कब से हम इंतजार कर रहें थें कि आप इस घर में हमारी
भाभी बन कर आईये. चलिए जल्दी…उठिए, चलिए मेरे साथ…”  छोटी बहन वहीं
दरवाज़े पर खड़े होकर बोल रही थी.
अच्छा आप चलिए मैं अभी आती हूँ. ज़रा इन्हें तो उठा दूँ..” उसनें
मेरी बहन से कहा
और हाँ भाभी…माँ ने कहा है कि लाल रंग की कोई साड़ी पहन कर मंदिर
जाइयेगा. लाल रंग शुभ होता है, भाई को भी लाल लाल पहना दीजिये आज न. ” इतना
कह कर, मुझे मुंह चिढ़ा कर छोटी चली गयी.
कुछ शब्द मेरे कानों में अभी तक
गूंज रहे थे जैसे “शादी… भाभी…चलिए… आप… इन्हें……” मुझे अब तक
कुछ समझ में नहीं आ रहा था. मैंने उससे पूछा इस बार फिर… “ये सब सच नहीं है, ये
सब एक सपना जैसा लग रहा है… किसी भ्रम सा…
वो मेरे और करीब आ गयी. बड़े प्यार
से अपने हाथों में मेरा हाथ लिया और कहा
 
क्यों लग रहा है ऐसा आपको? ये कोई भ्रम कोई छलावा नहीं है.  देखिये,  मैं हूँ न आपके
साथ. हम यही तो चाहते थे कि हम दोनों साथ रहे. मैं आपके साथ रहूंगी
हमेशा… जिंदगी भर.  बस आपके साथ….”
मैं उसे देख मुस्कुराने लगा था.
हाँ, ये सच है…मैंने खुद से कहा. ज़माने
की सारी खुशियाँ जैसे उस एक पल में सिमट आई थी. उसका हाथ मेरे हाथ में था
, और उसकी इन बातों ने मुझे यकीन दिला दिया था कि कहीं कुछ भी अजीब नहीं
है.
“चलिए अब, वरना आपकी बहनें फिर से
यहाँ आ जायेंगी…” वो मेरे पास से उठ कर जाने लगी
. मैंने उसे रोकना चाहा “कहाँ जा रही हो? बैठो यहीं, तुम चली गयी तो मैं फिर से तन्हा हो जाऊँगा..”
उसने मुस्कुराते हुए कहा ” अरे
मैं कहाँ जाऊंगी
, मैं तो यहीं हूँ.
आप तैयार हो जाइए
, मैं आपकी बहनों के पास जा रही हूँ.
बहुत प्यार करते हैं न आप अपनी बहनों से. मैं भी उन्हें अपनी बहन से कम नहीं
समझूंगी.”
वो जाने लगी,  दरवाज़े पर खड़ी
हो कर वो मेरी तरफ देखकर प्यार से मुस्कुराने लगती है. मुझे एकाएक डर लगने लगता
है. बहुत ज्यादा डर. मुझे ऐसा लगता है कि जैसे वो दरवाज़े के उस तरफ चली गयी तो
मैं उसे फिर कभी नहीं देख पाऊंगा
.  कभी नहीं मिल
पाऊंगा. मुझे ऐसा लगने लगता है कि जैसे जिंदगी मेरे सामने से जा रही है और मैं उसे
रोक भी नहीं पा रहा. मैं चीखना चाहता हूँ. चिल्लाना चाहता हूँ
. लेकिन आवाज़ धोखा दे दे रही है.
दरवाज़ा बंद हो जाता है.  वो चली जाती है. मैं
फिर बिस्तर पर लेट जाता हूँ. आवाजें बाहर से अभी भी आ रही हैं. उसकी आवाज़ भी
सुनाई दे रही है.
मुझे फिर नींद आने लगती है. शायद सो
ही चूका हूँ कि मोबाइल की रिंग सुनाई देती है. मोबाइल मेरे तकिये के पास रखा हुआ
है. मैं मोबाइल उठा नहीं पाता हूँ. कुछ देर बाद फिर से मोबाइल बजता है, इस बार
शायद कोई एसएमएस आया है. मेसेज देखने के लिए मैं नींद में ही फोन उठाता हूँ..
 
5Missed Calls
1 New Message – Good Morning. Wake up. Your train is
on right time, at 6 in the morning. We will be at platform. Come Soon.
मैं हड़बड़ा के उठता हूँ. धड़कन एकदम
तेज चल रही होती है. आँखों के सामने सारा नज़ारा बदला हुआ सा दिखता है. सामने वही
टेबल दिख रहा है
, वही लैपटॉप..वही किताबें, वही मनहूस सा मेरा कमरा.
क्या वो कोई सपना था? मैं अपने आप से ही पूछने लगता हूँ.
हाँ वो एक सपना था…तुम सपना देख
रहे थे… हताश होकर खुद से ही कहता हूँ मैं.
बहुत देर तक मैं उसी अवस्था में
रहता हूँ
,  फिर हताश सा बिस्तर पे लेट जाता हूँ. डायरी का एक पन्ना खुला हुआ
है
, जिसे पढ़ते हुए रात में जाने कब सो गया था. लिखा है उस
पन्ने पर –
कुछ सपने कभी सच
नहीं होते”
 
मैं घड़ी देखता हूँ.,.सुबह के चार बजे हैं. सुबह के चार? सुबह का सपना…? सुबह के सपने सच होते हैं, लोगों से सुनते आया
हूँ मैं. लेकिन इस पार, ये सपना…पता नहीं….
सोचता हूँ कि इस सपने को अपनी डायरी
में लिख लूँ, लेकिन हिम्मत नहीं होती. कहीं पढ़ा कोई शेर याद आता है, बस उसी को लिख
पाता हूँ डायरी के उस पन्ने पर..
मेरे पास जमा
भीड़ को देख बदगुमान न हो
मैं आज भी तन्हा हूँ, मैं हूँ और बस तेरी यादें हैं”



Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

19 COMMENTS

  1. Bahut achcha lagaa…aur haan bhaiya…sapne poore hote hain..jatan karo to sab kuch milta hai..aur agar nhi milta to wo kabhi hamare liye tha hi nahi..:) achcha laga aapke vichaar padke…mobile me hindi thodi kat kat ke aati hai..to laptop pe ja ke hi pad liya….

  2. तुम्हारे सपने के लिए आज दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां याद आ गईं..मेरी ही दुआ समझो इसको:
    .
    जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
    भावना की गोद से उतर कर
    जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें।
    चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये
    रूठना मचलना सीखें।
    हँसें
    मुस्कुराऐं
    गाऐं।
    हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें
    उँगली जलायें।
    अपने पाँव पर खड़े हों।
    जा तेरे स्वप्न बड़े हों।

  3. जो समझो…
    ये सब वो लिखा हुआ है जो एक समय से मेरे ड्राफ्ट में सेव था…आज पढ़ा तो पता नहीं क्यों इसे शेयर कर दिया…
    अगर याद हो तुम्हे तो एक कविता मैंने बहुत पहले शेयर की थी…करीब दो तीन महीना पहले…उसी दिन की बात है ये…कविता इसी पे आधारित है..

    (डायरी का फोटो जरुर आज का लिया हुआ है 🙂 )

  4. arre yeh kaisa post thaa! pehle padhte padhte to main hass rhe thi aur fir aansu aa gye ! bahut khoobsurat!

    aur haan agar saache dil se kuch chaho to sapna sapna nhi haakeekat hai!

  5. अरे तुमने वो डायलोग नहीं सुना क्या?" कोई इच्छा दिल से की जाये तो उसे पूरा करने में सारी कायनात लग जाती है ..तुम्हारा सपना भी जरुर पूरा होगा 🙂
    वैसे लिखा बहुत ही प्यारा है 🙂

  6. बस एक पंक्ति….ये सपना पूरा हो जाए….भोर का सपना वैसे भी पूरा हो जाता है…So keeping my fingers crossed 🙂

  7. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    Thanks
    Domain For Sale

  8. huuuuuuuuuuu….padh ke soch rahi hu kya comment karu main….padhte padhte pata nhi kaha chali gai main…lekin andaza tha ki ye koi sapna hi hoga….bhut sundr …..

  9. सपने जो शायद बहुत कम लोगों के ही सच होते हों या पूरे होते हों,मगर सपना देखता हर कोई है। फिर चाहे वो अच्छा हो या बुरा, छोटा हो या बड़ा वो कहते है न जिंदगी मे यदि आगे बढ़ना है। तो सपना भी बड़ा देखो…बहुत सुंदर रचना पढ़ कर लगा जैसे कोई फिल्म चल रही हो….मुझसे भी किसी ने कहा है की अगला लेख मैं भी सपनों पर ही लिखूँ आप के जितना खूबसुसरत तो शायद न लिख पाऊँ मगर लिखूँगी जरूर 🙂 शुभकामनायें….

  10. पता है…पिछली बार जब ये पोस्ट पढी थी तो जाने क्यों चाह कर भी कमेन्ट नहीं कर पाए थे…| पर आज ये पोस्ट फिर से पढ़ते वक्त अचानक याद आया…किसी ने हमसे कहा था…विश्वास रखना…ख़्वाब पूरे भी होते हैं…|
    इस पोस्ट के सन्दर्भ में नहीं कह रहे…बस याद आ गया यूं ही…:) 🙂 🙂

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