लव इन दिसम्बर

“मैंने अगर कोई फिल्म बनाई कभी..तो फिल्म जैसी भी बने आई डोंट केअर…फिल्म का नाम अच्छा होना चाहिए…जैसे???? 
लेट मी थिंक..स्वीट दिसम्बर..या लव इन दिसम्बर…या फिर दिसम्बर रोमांस?..?
नहीं नहीं ..अगर कभी मैंने कोई फिल्म बनाया तो उसका नाम होगा ‘लव इन दिसम्बर’.हाँ, बस ये नाम…फाईनल!! कितना क्यूट नाम है…देखो तो, नाम से ही प्यार टपक रहा है….एकदम दिसम्बर पे सूट करता है..क्यूंकि दिसम्बर भी तो प्यार का महीना है..”.
ये तुम कहा करती थी…तुम्हे दिसम्बर महीने से प्यार था…मौसमों या फिर किसी खास महीने से प्यार करना तुम्हारे लिए कोई नयी बात नहीं थी..मुझे हमेशा आश्चर्य होता था कि कोई आखिर किसी मौसम या फिर महीने से इस तरह कैसे प्यार कर सकता है? लेकिन तुम करती थी प्यार..बेइंतहा प्यार…दिसम्बर से प्यार करने की तुम्हारे पास वजह भी काफी थी..तुम्हारा जन्मदिन दिसम्बर में, तुम्हारी दादी का जन्मदिन भी दिसम्बर में ही..बड़े दिनों की छुट्टियों में ही तुम पहली बार पटना आई थी और दिसम्बर से ही जाड़े की शुरुआत होती है..गर्मियों को छोड़ बाकी सारे मौसमों और महीनों की तारीफ़ के लिए तुम्हारे पास अलग अलग किस्म के शब्द थे.जैसे दिसम्बर को तुम कहती थी – ‘टेन्डर दिसम्बर’..तुम अक्सर कहा करती थी…दिसम्बर इज द मन्थ ऑफ टेन्डरनेस एंड रोमांस.हमारी दोस्ती भी दिसम्बर के आसपास ही हुई थी और जाड़ों में ही हम पटना की सड़कों पर हद दर्जे की आवारागर्दी किया करते थे.तुम अक्सर कहती थी कि “अगर मैं तुमसे नहीं मिलती, अगर हमारी दोस्ती नहीं हुई होती तो पटना से भी मेरी दोस्ती नहीं हो पाती कभी..ये शहर मेरे लिए हमेशा अजनबी ही रहता”. जानती हो, ऐसा तुम सोचती थी.लेकिन सच तो ये है कि पटना शहर से दोस्ती तुमने और मैंने साथ साथ की है.इनफैकट सच कहूँ तो तुम ना रहती साथ तो शायद पटना में रहते हुए भी पटना से मेरी दोस्ती नहीं हो पाती कभी…तुमसे मिलने से पहले तक पटना में रहते हुए भी मैं पटना से उतना ही अनजान था जितनी तुम.

उन दिनों अक्सर मुझे ये सोच कर बड़ा आश्चर्य होता था कि हमारी दोस्ती हुए कुछ ही दिन हुए थे और तुम मेरे साथ पटना घूमने लगी थी..लेकिन ये तुम्हारी पुरानी आदत थी..जो भी व्यक्ति तुम्हे पसंद आ जाता था उससे तुम तुरंत बातें करने लगती थी..और उसे अपना दोस्त बना लेती थी…मुझे कभी कभी तुम्हारी ये आदत थोड़ी अजीब तो लगती थी लेकिन जल्द ही मैं समझ गया था कि तुम लोगों से रिश्ते भी बहुत सोच समझ के बनाती हो..तुम्हारे साथ पटना घूमने के क्रम में कितने नए इक्स्पिरीअन्सेज मुझे हुए हैं..चाहे वो गांधी मैदान में ‘ब्रेड रोल’ खाना हो या फिर तुम्हारे मोहल्ले में समोसे और पकौडियां खाना…चाय पीने की आदत भी तो एक तरह से तुम्हारी लगाई हुई ही है न…याद है तुम्हे? मैंने एक कंप्यूटर इन्स्टिटूट में दाखिला लिया था तो तुमने भी उसमे एडमिसन ले लिया था, और वो भी बस इसलिए की क्लास हर वीकेंड सुबह सुबह होती थी और वो सर्दियों के दिन थे…तुम्हे सुबह के कोहरे में घर से बाहर निकलने का और रोड किनारे चाचा की दुकान पर चाय पीने का इससे बेहतर बहाना और क्या मिल सकता था?

लेकिन दिसम्बर हमेशा तुम्हारे लिए खुशियाँ लेकर नहीं आया.दिसम्बर के ही दिन थे जो तुम्हारे जिंदगी के सबसे बुरे दिनों में से थे.और शायद तुम्हारे इतने दूर जाने की बात भी दिसम्बर में ही शुरू हुई थी..और यही वो दिन थे जब मुझे पहली बार महसूस हुआ कि तुम अपने आसपास के लोगों को संभालना भी जानती हो…अगर सच पूछो तो दिसम्बर ही वो महीना था जब तुम्हे अपनी जिंदगी के सबसे कड़े इम्तिहान से गुज़ारना पड़ा था..और तुमने बहुत अच्छे से सबकुछ संभाला था..अक्सर होता ये है कि तुम्हारी जैसी लड़कियां जब ऐसे समय से गुज़रती हैं तो वो बड़ी तो हो जाती हैं लेकिन उनकी मासूमियत खो जाती है और वो अचानक एकदम गंभीर सी हो जाती हैं..लेकिन तुम्हारे अंदर की मासूमियत बरक़रार रही…अभी तक वैसी ही सही-सलामत है, या यों कहूँ की वक्त के साथ वो मासूमियत मुझे बढ़ते ही दिखाई देती है.

एक तुम्हारी छोटी सी मासूम आदत थी(या बचपना कह लो)…तुम अक्सर फिल्मों को उनके नाम से पसंद कर लिया करती थी.जिन फिल्मों के नाम तुम्हे अच्छे लगते उन्हें तुम हर कीमत पर देखती थी और जिनके नाम तुम्हे पसंद नहीं आते, वो फिल्म चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, तुम उन्हें नहीं देखती थी…पिछली बार तुम जब आई थी तो मेरे लिए तीन फिल्मों(मेसेज इन अ बोटल, समवेयर इन टाईम और इटर्नल सन्शाइन ऑफ स्पॉटलेस माईंड) की सी.डी लेते आई थी..और मुझसे कहा था..”देखो तो इन फिल्मों के नाम कितने क्यूट से हैं..इन्हें जरूर देखना”. मुझे पहले तो बड़ी हंसी आई, लेकिन ताज्जुब तब हुआ जब तीनो फ़िल्में मुझे वाकई अच्छी लगीं.जिस लिफ़ाफ़े में तुमने मुझे ये तीन सी.डी दिया था, उसमे एक खत भी था, जो एक तरह से तुम्हारा आखिरी खत था..बड़ी अच्छी और प्यारी बातें तुमने उस खत में लिखी थी..उस खत में खास कर के एक फिल्म ‘इटर्नल सन्शाइन ऑफ स्पॉटलेस माईंड’ का तुमने बहुत जिक्र किया था और मेरे लिए उस खत में एक छोटा सा क्विज जैसा भी कुछ था.तुमने पूछा था कि ‘इस फिल्म के एक सीन में बैकग्राऊंड में कौन से तीन पुराने हिंदी गाने चल रहे होते हैं?
तुमने लिखा था खत में की –

“पता है इस फिल्म का जो हीरो है उसका नाम ‘जोल’ और हीरोइन का नाम ‘क्लेमेनटाईन’ रहता है..दोनों एक बार ‘नाईट पिकनिक’ पर जाते हैं जहाँ सिर्फ बर्फ ही बर्फ होता है…वो दोनों एक दूसरे का हाथ थामे बर्फ पर ही लेट जाते हैं(सोचो कितना अच्छा लगता होगा!) और जोल कहता है क्लेमेनटाईन से

‘I could die right now..I m just happy…I’ve never felt that before…I m just exactly where I want to be…कितना रोमैंटिक है न..?सो स्वीट..!!काश हम दोनों भी किसी दिन ऐसे ही ‘नाईट पिकनिक’ पे जा सकते और पूरी रात बर्फ पर लेटे रहते…पता है इस फिल्म की कहानी क्या है? “जोल और क्लेमेनटाईन दो लवर्स हैं जो दो साल से साथ साथ रह रहे हैं, लेकिन एक बुरी लड़ाई के बाद दोनों अलग होने का फैसला करते हैं.क्लेमेनटाईन साइअन्टिफिक तरीके से जोल से सम्बंधित सभी यादों को हमेशा के लिए मिटा देती है..एक दिन जब जोल उससे मिलने जाता है और वो उसे पहचान नहीं पाती है तो वो बड़ा परेसान हो जाता है.उसे बाद में पता चलता है की उसने उससे जुडी सभी स्मृतियों को हमेशा के लिए मिटा दिया है तो वो भी निश्चय करता है कि वो भी ‘क्लेमेनटाईन’ से जुडी सभी स्मृतियों को अपने दिमाग से हमेशा के लिए इरेस कर देगा.वो ये साइअन्टिफिक प्रक्रिया शुरू भी कर देता है, लेकिन जैसे जैसे वो अपनी पुरानी स्मृतियों में जाने लगता है(उन्हें मिटाने के लिए) तो उसे अहसास होता है कि ‘क्लेमेनटाईन’ के साथ बीते हुए समय कितने खूबसूरत थे.वो इस साइअन्टिफिक प्रक्रिया से लड़ने और अपनी स्मृतियों को बचाने की पूरी कोशिश करता है लेकिन एक एक कर के क्लेमेनटाईन से जुडी सभी यादें उसके मस्तिष्क से हमेशा के लिए मिट जाती हैं..सिवाय एक अंतिम स्मृति के कि जब क्लेमेनटाईन जोल से कहती है ‘Meet me in Montauk’ और वो इसी अंतिम स्मृति को पकड़ के क्लेमेनटाईन को फिर से पाता है..”  वैसे तो कैसे वे दोनों फिर से अजनबी की तरह कैसे मिलते हैं एक दुसरे से वो तुम्हे बड़ा मजेदार लगेगा, बहुत स्वीट!…वो मैं अभी नहीं बताउंगी..तुम खुद देख लेना…
देखो, मेरे कहने का तो मतलब सिर्फ इतना है कि जोल तो पहले शुरू शुरू में बड़ा खुश हुआ था कि वो अपनी स्मृतियों में से क्लेमेनटाईन को हमेशा के लिए मिटा दे रहा है(क्यूंकि क्लेमेनटाईन ने उसे पहले इरेस किया था और उसे लगा ये रिवेन्ज है)…लेकिन प्यार में रिवेन्ज टाईप का कुछ थोड़े न होता है…तो इसलिए उसे धीरे धीरे अहसास हुआ कि वो उससे कितना प्यार करता है और पता है वो बेचारा बहुत कोशिश करता है कि अपनी यादों को बचाए लेकिन सो सैड वो बचा नहीं पाता..I felt very bad about him at that time..But I am happy that movie has a happy ending….
देखो, मैं सिर्फ ये कह रही हूँ तुमसे कि अगर कभी तुम्हे भी लगे कि तुम मुझे भुल रहे हो तो प्लीज हर कोशिश करना की मैं तुम्हारे दिमाग के किसी कोने में घुस के बैठी रहूँ..तुम्हारा तो बड़ा सा दिमाग है..साईड में ही कोई छोटी सी जगह दे देना..लेकिन कभी भी मेरी कोई भी याद को अगर इरेस किये तो देख लेना..मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.

And one more thing…तुम कहते हो न कि मैं इम्पल्सिव हूँ..पता है इस फिल्म में क्लेमेनटाईन भी जोल से यही कहती है कि “You know me..I am impulsive”तो जवाब में जोल कहता है “That’s what I love about you”…कितना स्वीट सा डायलोग है न? [[सीखो कुछ..कुछ तो सीखो]]

तुमने जिस बड़े लिफ़ाफ़े में मुझे ये तीनो सी.डी,खत और ग्रीटिंग्स दिए थे…उसके फ्रंट पे इसी फिल्म का टैग-लाईन(शायद) तुमने लिखा था. –
 “You Can Erase Someone from your mind.Getting them out of your heart is another story……………………. …………………samjheyyyy”
और नीचे लिखा हुआ था,
–  A gift to you by _____- The Vindictive Little Bitch:D

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

17 COMMENTS

  1. इस फ़िल्म का गीत भी तो लिखो ..जिसे पहले ही सब गाने लगे हैं …
    कभी-कभी जो दिल करे/कहे… उसे लिख देना अच्छा लगता है न !!

  2. ओह अभी…तुम इतनी सादगी से कैसे लिख लेते हो ये सब कुछ…ऐसे पढ़ना इतना अच्छा लगता है कि बता नहीं सकती.

    प्यार में ऐसी मासूमियत अब तक कैसे बचा के रखे हुए हो…नज़र न लगे हमारी.

  3. अभी जी … एक दो तीन नहीं कई बार इसे पढ़ रहा हूँ और सचमें घर करती जा रही है ये चिट्ठी … पता है ये बस केवल चिट्ठी नहीं है … बहुत कुछ है उसके आगे भी …
    और वो …"You Can Erase Someone from your mind.Getting them out of your heart is another story……………………. …………………samjheyyyy"

    क्या गज़ब लिखते हो यार … हर पढ़ने वाला अपनी यादों में जीने लगता है …

  4. तुम बच्चों के साथ जी तो सकता हूँ.. गुज़ारे हुए लम्हों को वापस नहीं ला सकता.. हमारे ज़माने में तो अंग्रेज़ी फ़िल्में होती नहीं थीं..!हमने जोन और मिशेल की फिल्म "फ्रेंड्स" देखी थी वैशाली में..
    अरे! तुम कार की बात करते हो और मैं बेकार की बात करने लगा.. सबसे अच्छी बात तुम्हारी पोस्ट की ये होती है कि तुम दिल से लिखते हो.. पढ़ने वाले को अपने साथ बहाकर ले जाना खूबी है तुम्हारी!गौड ब्लेस यू!!

  5. kaafi romantic post tha abhi bahut accha likha hai.

    December hame bhi bahut pasand hai aur hamari thinking kaafi milti julti hai iss baat ko le kar.

    aur haan main behtar samajh sakta hun ki tumne iss mahine ko bangalore men kitna miss kiya hai.

  6. absolute sweetness!!!
    तुम्हारा writing style!!! और हाँ….नाम सुन्दर हो तो हम भी movie देख डालते हैं…
    p.s. i love you 🙂 this is one of them !!

    keep writing mesmerizing posts!!!
    anu

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