सर्दियों की आहट और मौसम का पहला खत..तुम्हारे नाम

बहुत दिनों बाद तुम्हे आज खत लिखने बैठा हूँ…ये खत तुम्हे क्यों लिख रहा हूँ ये मैं नहीं जानता.क्या लिखूंगा इस खत में ये भी नहीं जानता..बस जानता हूँ तो इतना की आज की रात तुम्हे एक ख़त लिखना है, सो खत लिख रहा हूँ.पिछले कुछ खतों की तरह इस ख़त को भी मैं तुम्हे दे तो नहीं पाऊंगा लेकिन फिर भी लिख रहा हूँ.जिस फोल्डर में तुम्हारे नाम लिखी बाकी की सभी चिट्ठियां रखी हुई हैं उसमे इस खत को भी रख दूंगा, कभी तुम आओगी अगर तो इन खतों को पढ़कर तुम्हे सुनाऊंगा.आज शाम से ही तुम्हारी बड़ी याद आ रही है..तुम्हारी छोटी बड़ी शरारतों को याद कर के लगतार मुस्कुरा रहा हूँ.कुछ देर पहले एफएम पर एक गाना सुन रहा था, और उसे सुनते हुए लगा की सच में उस गाने की एक लाईन ख़ास तुम्हारे लिए ही लिखी गयी है…”जग मुझपे लगाए पाबंदी, मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की…”.
सच में, तुम इस दुनिया की नहीं हो…इस दुनिया से अलग कोई लड़की हो तुम.सोचता हूँ कभी तो लगता है की तुम बाकी सभी लड़कियों से कितनी अलग हो.कहाँ बाकी लडकियाँ ऐसी बहकी बहकी बातें सोच लेती हैं जैसे तुम सोचती हो?तुम्हारी हरकतें भी तो अजीब होती हैं न, कहाँ सब लडकियाँ ऐसी हरकतें करती हैं? चींटियों को तुम देखती हो, उनसे बातें करने लगती हो?तुम आसमान में सड़क बनाने की बात करती हो…तुम्हे लगता है की तुम कोई जादू करोगी और दो हथेलियाँ हमेशा के लिए आपस में जुड़ जायेंगी…फुल और पत्तियों को तुम अपने बैग में जमा कर लेती हो..हर मौसम के अजीब अजीब लौजिक्स और नियम होते हैं तुम्हारे…कहाँ सब लडकियाँ ऐसी होती हैं? कहाँ सबकी ऐसी सोच और ऐसी हरकतें होती हैं? सच में तुम इस दुनिया की नहीं लगती हो…जितनी अजीब हो तुम उतने ही अजीब तुम्हारे लौजिक्स होते हैं….

एक दफे याद है, तुमने पता नहीं किस बात पर कहा था मुझसे की सर्दियों में पर्पल रंग ‘लकी’ होता है..और जितना संभव हो हमें पर्पल रंग का इस्तेमाल करना चाहिए.तुमने जिस दिन ये बात कही थी उसके अगले ही दिन तुमने मुझे एक पर्पल रंग की डायरी लाकर दी थी..उसे देते हुए तुमने कहा था, की इसमें तुम अपनी कवितायें लिखना, सर्दियों वाली कवितायें..किसी और मौसम की कवितायें इस डायरी में लिखना अलाउड नहीं है.याद है न तुम्हे, मैं कितना हँसा था इस बात पर..और मेरे हँसने पर तुमने कैसे अपने बैग को घुमा कर मेरी पीठ पर दे मारा था…और रूठ गयी थी तुम…
लेकिन सच में यार, क्या गज़ब की लौजिकल थिंकिंग थी तुम्हारी….? पर्पल रंग का इस्तेमाल सर्दियों में करना चाहिए???हैरत होती थी मुझे की तुम कैसे ये सब बातें सोच लिया करती हो? मुझे तो कभी भी तुम्हारी ऐसी लॉजिकल बातें समझ में नहीं आती थीं, और अगर गलती से भी मैं कुछ भी कहता तुम्हारे इन लौजिक्स पर तो तुम नाराज़ हो जाया करती थी….मुझे ही क्या??किसी को भी तुम्हारी ये बातें समझ में नहीं आती थीं.कोई अगर इन बातों को समझने की कोशिश भी करे तो कैसे?तुम तो इनका अर्थ बताने से रही..और कोई खुद से अंदाज़ा लगाए भी तो कहाँ तक? अरे पर्पल रंग का सर्दियों से क्या कनेक्सन होता है? पर्पल रंग के डायरी में सिर्फ सर्दियों में ही क्यों लिखना चाहिए? इन बातों को कोई समझे भी तो कैसे??अब हर के पास तो तुम जैसा यूनिक दिमाग है नहीं.

खैर…आज शाम तुम्हारी लौजिक्स के पीछे नहीं भागने वाला हूँ, आज तो बस युहीं बातें करने का मन कर रहा है…पता है यहाँ सर्दियाँ शुरू हो गयीं हैं.शायद तुम्हे मैंने सबसे ज्यादा खत सर्दियों में ही लिखे हैं…है न? तुम्हे जो पहला खत मैंने दिया था वो भी सर्दियों में ही लिखा था न और तुम्हे अपने हाथों से दिया था.शायद नवम्बर की पहली तारीख थी वो? है न? दिवाली के तीन दिन पहले की एक शाम थी.तुम दिवाली की छुट्टियों में कलकत्ता जा रही थी.और मैंने तुम्हे मिलने के लिए बुलाया था.मिलने का तो बस बहाना था, मैं तुम्हे एक लम्बा खत देना चाहता था…वो ख़त भी क्या था, पूरा एक नोटबुक ही तो था जिसे मैंने पता नहीं किन रैंडम बातों से पूरा भर दिया था…

याद है न तुम्हे? वो पतली सी स्पाईरल बाईंडिंग वाली एक नोटबुक थी और उसी में तुम्हे मैंने लेटर लिखा था(तुमने बाद में उसे एक नाम भी दे दिया था “नोटबुक लेटर”). सच कहूँ तो मेरा कोई इरादा नहीं था उस नोटबुक में लिखने का…एक दिन पहले मैं तो स्टेशनेरी गया था एक लेटर पैड खरीदने, लेकिन ये नोटबुक वहां दिख गयी…बड़ी खूबसूरत सी थी तो मैंने तुरंत खरीद भी लिया इसे.जाने क्या सोच कर मैंने पहले पन्ने पर तुम्हारा नाम लिखा और फिर तुम्हे खत लिखना शुरू कर दिया…पूरी शाम मैं लिखता रहा हूँगा, और जब रात में डिनर के लिए माँ ने आवाज़ लगाई थी तब तक मैं नोटबुक के आखिरी पन्ने पर पहुँच चूका था….मुझे थोड़ी हैरानी भी हुई की तुम्हे मैं पहली चिट्ठी लिख रहा हूँ और वो भी इतनी लम्बी?ये तो जैसे एक डायरी ही लिख दिया था मैंने तुम्हारे नाम..लिखने के बाद मैंने जोड़ा तो नहीं था लेकिन बाद में तुमने ही एक दिन बताया था की उस नोटबुक में बत्तीस पन्ने थे.

वो शाम तो तुम्हे अच्छे से याद है न जब मैंने तुम्हे वो खत दिया था? …ऑफ़कोर्स तुम्हे याद होगा.
हम दोनों चाहे भी तो उस शाम को भूल नहीं सकते हैं…दिल में फ्रिज होकर रह गयी है उस शाम की तस्वीर.कितनी खूबसूरत शाम थी न वो? नवम्बर की पहली तारीख थी और सर्दियों की शुरुआत हो गयी थी…सड़कों पर तो कुछ लोग गर्म कपड़ों में नज़र आने लगे थे…लेकिन बहुत से लोगों ने अब तक स्वेटर और जैकेट्स पहनने नहीं शुरू किये थे.मैं उनमे से था…सिर्फ एक टी-सर्ट पहन कर तुमसे मिलने चला आया था..
और तुम..तुम बाकायदा गर्म कपड़ों में थी…एक जैकेट, हाथों में दस्ताने(सिरसली यार? वो हाथों में दस्ताने पहनने के दिन थे क्या?) और एक बड़ा ही स्टाईलिश सा वूलेन कैप, जिसे तुम्हारी दीदी लन्दन के किसी हाईफाई दूकान से खरीद लायी थी(तुमने ही तो कहा था एक बार की मेरी हाईफाई दीदी आयीं हैं लन्दन से, मेरे लिए हाईफाई टोपी लायीं हैं).
उस शाम तुमने जैसे ही मुझे देखा था, बिना किसी स्वेटर या जैकेट के तो तुमने एक जबरदस्त डांट लगा दी थी मुझे “ऐसे हिरोगिरी दिखाओगे? ठण्ड लग जायेगी न तो सारी मस्ती निकल जायेगी”. तुमने बिलकुल यही शब्द कहे थे और कुछ इतने ज़ोर से तुमने कहा था की पास ही खड़े कुछ लोग हमारी तरफ देखने लगे थे.

जैसे तैसे तुम्हे चुप करवा कर, तुम्हारी डांट सुन कर और अपनी गलती मानकर हम दोनों आगे बढे….शहर में एक नया कॉफ़ी शॉप खुला था.वो असल में कॉफ़ी शॉप तो था नहीं(ये नाम तो उसे हम दोनों ने दिया था न), वो फ़ास्ट फ़ूड का एक छोटा सा रेस्टुरेंट था, जहाँ कॉफ़ी भी मिलती थी…लेकिन हमने वहां कॉफ़ी या चिकन सूप के अलावा और कुछ कभी खाया हो ये याद नहीं आता.

एक तो तुम मेरे स्वेटर ना पहनने से नाराज़ थी और पहले की भी कुछ बातें थी जिससे तुम रूठी हुई सी थी..जैसे ही हम कोने वाली अपने रेगुलर टेबल की तरफ आगे बढे और वहां बैठते ही तुमने कहा था “साहब आजकल आप बहुत गलतियाँ कर रहे हैं, आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी मुझे मनाने के लिए”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा था, “मेरे पास भी तुम्हारी इस नाराजगी का एक गेरन्टीड ईलाज है”, और ये कहते हुए मैंने बैग से उस नोटबुक को निकला और तुम्हारे आगे टेबल पर रख दिया…”लो, तुम्हारे लिए, दिवाली का तोहफा”.
तुमने बड़े ही अजीब ढंग से उस नोटबुक को देखा था…जैसे वो नोटबुक ना होकर कोई रहस्मयी या जादुई किताब हो…फिर तुमने उसे अपने हाथों में लिया और बहुत देर तक तुम उसे हाथों में ही पकडे रही थी..जैसे ये तय नहीं कर पा रही हो की इसे खोले या न खोले..तुम बस उसे लगातार देख रही थी..नोटबुक के कवर पर मैंने हरे रंग के पेन से दो शब्द लिखे थे …”फॉर यु”.तुम शायद इन्ही दो शब्दों को लगातार देख रही थी..
कोई और वक़्त होता तो मैं शायद मजाक में ये भी कह देता…”चश्मा लगाने की नौबत आ गयी क्या?दो शब्द भी नहीं पढ़ा जा रहा तुमसे..”
लेकिन तुम्हारा चेहरा लाल सा हो आया था…तुम एकाएक बहुत इमोशनल सी हो गयी थी..उस नोटबुक को तुमने फिर वापस टेबल पर रख दिया और मेरी तरफ देखते हुए पूछा था तुमने “क्या है ये?क्या लिखा है इसमें?”
मैंने कोई जवाब नहीं दिया था…तुमने थोड़ा और सोचा और फिर कहा था “ओके, मैं इसे खोल कर देखने जा रही हूँ…आई डोंट नो इसमें क्या लिखा है तुमने? तुम्हारी कविताओं का कलेक्सन है क्या ? या वो जो मैं सोच रही हूँ? खोल कर देखती हूँ इसे…देखूं न?

और जैसे ही तुमने नोटबुक को खोला था, और उसपर लिखा अपना नाम पढ़ा था… “A letter to my princess ______ ” तुम बिलकुल हैरान सी रह गयी थी.मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता उस वक़्त तुम्हारे चेहरा का क्या एक्स्प्रेसन था. तुमने कुछ भी नहीं कहा था, बस अपने दोनों हाथों से अपने चेहरे को ढँक लिया था और तुम्हारी आँखों में आंसूं आ गए थे…कुछ देर तक तुम कुछ भी बोल नहीं सकी थी..तुम बस मुझे देखती रही थी और फिर थोड़ी देर बाद तुमने कहा था “Oh My God! Its a notebook letter…मेरा ड्रीम था कोई मुझे ऐसा एक नोटबुक लेटर लिखकर दे..its my most precious gift…”.कुछ देर तक तुम उसके पन्ने पलटते रही थी और फिर आँखों में जो कुछ बूंद आँसूं के आ गए थे उन्हें पोछते हुए तुमने कहा था…”बड़े क्रीएटिव हो गए हो यार…मेरी संगत का देखो तो कितना खूबसूरत असर हो रहा है तुमपर…”

आज भी जब उस शाम की बातें याद आती हैं तो चेहरे पर एक बड़ी मुस्कराहट आ जाती है…तुम्हारी बहुत याद भी आती है, जब इन बातो को याद करता हूँ…जानती हो तुम, अब अक्सर तुम्हे ख़त लिखने के बाद मैं किस चीज़ को सबसे ज्यादा मिस करता हूँ..तुम्हारे चेहरे के उस एक्स्प्रेसन को…बड़ी प्यारी सी मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर आ जाती थी….मेरी चिट्ठी को अपने हाथों में लेते ही कैसे तुम्हारा चेहरा खिल उठता था, आँखों में एक चमक आ जाती थी…तुम बहुत खुश हो जाया करती थी…शर्म और इक्साइट्मन्ट का मिला जुला भाव तुम्हारे चेहरा पर होता था…सच में मुझे तुम्हारा वो खुश चेहरा आज भी बहुत याद आता है…अभी ये चिट्ठी लिखते वक़्त भी मन में यही सोच रहा हूँ की काश तुम्हे मैं अपने हाथों से ये चिट्ठी दे पाता तो? लेकिन शायद अब ये मुमकिन नहीं है…

तुम्हे अपने हाथों से खत दे पाना अगर मुमकिन ना भी हो, तो भी तुम्हे चिट्ठी तो मैं लिख ही सकता हूँ न? इसमें तो कोई पाबन्दी नहीं है…….
तो देखो, आज इस मौसम की पहली चिट्ठी तुम्हे लिख रहा हूँ….इस बार सर्दियों में तुमसे ढेर सारी बातें करने का मन है…खूब चिट्ठियां लिखना चाहता हूँ तुम्हे…जाने कितनी और चिट्ठियां लिखूंगा इन तीन महीनों में….अभी तो ये पहली ही चिट्ठी है

बाकी और बहुत सी बातें हैं, वो अगले खत में…..!

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

13 COMMENTS

  1. ये गुनगुनी-सी धूप के जैसी प्यारी…दिल तक को सकून पहुँचाने वाली पोस्ट है तुम्हारी…। पढ़ना शुरू करो तो अन्त तक बिना रुके पढ़ते जाओ और फिर अचानक लगता है…अरे, इतनी जल्दी ख़त्म हो गई…। ऐसे ही लिखते रहो…पढ़ाते रहो…।

  2. अरे भाई कुछ ठीक नहीं लग रहा……….. 🙁
    टिकट के पैसे हमसे लो (अच्छा चाहो तो कूरियर के ले लो…) और फटाफट पोस्ट करो इस चिट्ठी को….
    ऐसी चिट्ठियां सहेजी जाती हैं मगर लिखने वाले के पास नहीं बल्कि जिसे लिखी है उसके पास…..

    [यूँ ही पूछ रही हूँ–notebook movies देखी है??? देखी होगी….न देखी हो तो देखना !!]

    अनु

  3. . "A letter to my princess ______ " तुम बिलकुल हैरान सी रह गयी थी.मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकता उस वक़्त तुम्हारे चेहरा का क्या एक्स्प्रेसन था…………….बहुत सुन्दर चिठ्ठी 🙂

  4. पहला कमेन्ट हाँलाकि मेरा है , पर सलिल चाचा का इतना खूबसूरत कमेन्ट पढ़ कर खुद को नहीं रोक पाई…| कितनी प्यारी बात कही है, इतनी प्यारी पोस्ट पर…| गुलाबी सर्दी हो सकती है तो सर्दी में पर्पल लकी क्यों नहीं हो सकता…??? सचमुच सोच के देखो तो…|

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