एक खाली सा दिन

सुबह के छः बज रहे थे. हमेशा की तरह आज भी वो अलार्म बजने के पहले ही जाग गया था. जाड़ों की सुबह इतनी जल्दी जागने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन फिर भी वो जाग गया. रात में कई बार उसकी नींद टूटती रही थी. कुछ अनसुलझे सवाल ऐसे थे जिसका जवाब उसके पास नहीं था…रात भर वे सवाल उसे परेशान करते रहे थे. बहुत देर तक वो बिस्तर पर यूँ ही पड़ा रहा, जैसे फैसला नहीं कर पा रहा हो कि उठे या न उठे. तीन दिन उसके अच्छे बीते थे. तीन दिन से उसके रिश्तेदार आये हुए थे तो तीन दिन वो काफी व्यस्त रहा लेकिन कल रात उनके चले जाने के बाद वो फिर से एकदम खाली सा हो गया था. उसने अपनी आँखें फिर से बंद कर ली… उठने का भी क्या फायदा? ना तो उसके पास कोई काम है ना ही शहर में कोई ऐसा जिससे वो मिल सके या जिनके साथ वक़्त बिता सके. आज का दिन कैसे कटेगा? – उसने सोचा. बहुत याद करने की कोशिश की उसने, लेकिन कोई भी ख़ास काम उसे याद नहीं आया. कुछ जॉब एजन्सीस में उसे जाना तो है, लेकिन वो भी तब जब उधर से कोई फोन आएगा.

फिर से एक खाली सा बेकार सा निरर्थक सा दिन उसे बिताना है…एक कोरा दिन जिसका कोई हासिल नहीं. आज फिर पूरा दिन यूँ हीं बसों में शहर घूमते हुए काटना है – उसने सोचा. एक हलकी बेचैनी ने उसे पकड़ लिया. वो उठ कर सुस्त क़दमों से अपने घर की खिड़की के पास आ पहुँचा. शीशे की उस बड़ी सी खिड़की से सामने मुख्य सड़क दिखाई देती थी. वो हर सुबह उठ कर अपने घर के खिड़की के पास आता और लोगों को काम पर जाते हुए देखता. हर कोई किसी न किसी काम के लिए  सुबह तैयार होकर घर से निकलता….लेकिन वो…उसे कोई काम नहीं है…और वो अपने घर की खिड़की से बाकी लोगों को काम पर जाते देख रहा है…उसने सोचा वो शहर के उन लोगों में से है जो फ़िलहाल बेकार बैठे है और जिन्हें सिवाए दिन भर निरुद्देश्य इधर उधर भटकने के कोई दूसरा काम नहीं है.
उसे ये ख्याल हमेशा बड़ा भयावह सा लगता है….कि वो उन लोगों में से है जो अभी खाली हैं…बेकार हैं, और घरों में बैठे हैं. खिड़की से उसने आँखें मोड़ ली और गैस पर चाय चढ़ा कर उसने अपने कमरे को एक बार देखा…उसका वो कमरा सस्ते दामों पर मिला एक स्टूडियो अपार्टमेंट था. यूँ तो वो अकेला रहता था लेकिन उसके कमरे को देखने पर लगता था जैसे वो परिवार के साथ रहा रहा हो.. कई सारी चीज़ें उसने जमा कर रखी थी….और जब कभी वो अपने कमरे का यूँ जायजा लेता हमेशा उसे लगता कि उसे इतनी चीज़ें जमा कर के रखनी नहीं चाहिए थी. कोई अनजाना उसके घर आता तो उसके घर को देखकर ये सवाल जरूर पूछता उससे कि शादी हो गयी आपकी? वो चुपचाप “ना” में गर्दन हिला देता. वो व्यक्ति फिर कहता, आपके घर को देखने से लगता है आप परिवार के साथ रहते हैं…वो इसका कुछ भी जवाब नहीं देता. ‘परिवार के साथ रहना’, ‘शादी’ इसके बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं. उसकी माँ भले हर दो तीन दिन पर इस विषय पर बात कर लेती लेकिन वो हमेशा उसके सवाल को टाल देता. माँ भी उसकी मजबूरी समझती, और वो ज्यादा सवाल नहीं करती…बात को रोक दिया करती. “शादी” के लिए वो शायद तैयार नहीं था. उसे ये शब्द किसी दूर की चीज़ मालूम लगती थी. वो इस बारे में कभी नहीं सोचता था. ऐसी कई बातें थी जिसके बारे में वो कभी नहीं सोचता…कुछ भी नहीं सोचता…ये वैसी चीज़ें थी जो उसके वश में शायद नहीं थी.
अपने कमरे में वो ज्यादा देर रह नहीं सका…जल्दबाजी में या शायद फ्रस्टेशन में वो तैयार होकर बाहर निकल गया. यूँ भी दोपहर के समय वो पूरा दिन अकेले कमरे में नहीं रहता था…दिन में घर पर रहना हमेशा उसके लिए असंभव सा रहा है. काम ना भी रहता तो भी वो निकल जाता था घर से. घर से निकलते ही वो सामने वाले होटल में चला जाता जहाँ वो कुछ देर बैठता और सुबह का अख़बार पढ़ता, वहाँ उस होटल में वो सुबह की दूसरी कप चाय पीता और कभी मन करता तो सुबह का नाश्ता भी कर लेता. चाय नाश्ता के अलावा सुबह इस होटल में आने की उसकी एक और वजह थी… यहाँ उसे अपने ही जैसे कई लोग मिल जाते जो हर सुबह चाय पीने और नाश्ता करने आते थे. वे यहाँ लम्बी बहसें किया करते थे….कंपनियों के रिक्रूट्मन्ट प्रोसेस, मैनेजमेंट पोलिसिस से लेकर देश की पोलिटिकल व्यवस्था तक हर बात पर वो सिस्टम को जी भर कोसते. वो बस दूर बैठे हुए उन लोगों की बहस सुनते रहता…कभी वो बहस का हिस्सा नहीं बना…वैसे भी ऐसे लोगों से वो दूर ही रहना पसंद करता था. लेकिन सुबह का ये वक़्त, उन लोगों को यूँ बहस करते देख उसे अच्छा लगता….उसे ये यकीन होता कि उसकी तरह दुनिया में और भी कई लोग हैं जो अभी काम के तलाश में हैं और पूरा दिन खाली हैं.
होटल में बैठे हुए वो हर दिन सोचता कि ये फेज है, और ये फेज भी गुज़र जाएगा. लेकिन उसे सिर्फ काम की चिंता नहीं थी. काम आज नहीं तो कल उसे मिल ही जायेगा….वो कभी काम के बारे में ज्यादा नहीं सोचता. उसे दूसरी  चीज़ों की फ़िक्र ज्यादा रहती, अपनी बड़ी बहन की ज़िन्दगी में चल रही  कुछ बातों की, एक दोस्त की, जो ज़िन्दगी के क्रिटिकल फेज पर खड़ी है…अपने घर की कुछ बातें जो वो ना चाहते हुए भी सोचता है…आने वाले दिनों में ये समस्याएं कैसे और कब सुलझेंगी…सुलझेंगी भी  या और उलझ जायेंगी….उसका दिमाग इन बातों में लगा रहता. वो ये जानता कि इन बातों को सोचने का कोई ख़ास फायदा नहीं और वक़्त आने पर सब बातें सुलझते जायेंगी. लेकिन फिर भी अकसर ये सारी बातें बहुत देर तक उसके दिमाग में चलती रहतीं. ऐसा नहीं है कि उसके लिए ये कोई नयी बात है. पहले भी वो बहुत उलझनों से गुज़रा है…लेकिन उन दिनों वो हमेशा इन बातों को इग्नोर करने में कामयाब रहता था…अब शायद वक़्त जैसे जैसे बीतता जा रहा है, वो इन बातों को नजरंदाज आसानी से नहीं कर पाता.. शायद अब ऐसे बड़े शहर में अकेले रहना वो नहीं चाहता. शायद उम्र के इस मोड़ पर आकर अकेलापन उसे थोड़ा सताने लगा है. कई बार उसने सोचा कि वापस घर लौट जाए. माँ भी कई बार उसे वापस आ जाने के लिए कह चुकी है. एक दो बार कमज़ोर घड़ियों में उसने लगभग तय भी कर लिया था कि अब बस बहुत हुआ…अगले दिन ही यहाँ से सामान समेट कर वापस घर चले जाना है. जैसे यहाँ खाली हूँ, वैसे ही वहाँ रहूँगा. कम से कम घर पर इस बात का तो भरोसा रहेगा कि मैं अकेला नहीं हूँ…लेकिन घर लौटना इतना आसान नहीं है…घर लौटने का मतलब होगा अपनी हार स्वीकार कर लेना…उसने कुछ लाईनें पढ़ी थी एक कहानी में, हालाँकि वो मन की बात हो सकती है या नहीं ये वो नहीं जानता…लेकिन उसे कहानी की वो बात याद आती है… “एक उम्र के बाद तुम घर वापस नहीं जा सकते. तुम उसी घर में वापस नहीं जा सकते, जैसे जब तुमने उसे छोड़ा था.” . वो आँखें बंद कर के कुछ सोचने लगता है.
“सर कुछ और चाहिए ?”
ये होटल के वेटर की आवाज़ थी. उसके सामने होटल का वेटर खड़ा था..उस वेटर ने उसे यूँ टोककर एकदम से उन ख्यालों से बाहर निकाल दिया था…जैसे अचानक ही किसी ने ब्रेक लगा दिया हो उन बातों पर…ऐसे पता नहीं कितनी ही बार हुआ होगा कि उस वेटर उसे किसी सोच से बाहर निकला है…यूँ टोक कर. हर बार वो सोचता कि  वेटर को वो बताये कि उसने कितना अच्छा कम किया उसके फ़ालतू के ख्यालों पर यूँ ब्रेक लगाकर…लेकिन वो बस मुस्करा कर उसे देखता है.
“नहीं……कुछ नहीं” कह कर होटल के बाहर निकल आया.
आज धूप निकली हुई है, दिन कितना अलग सा लग रहा है….होटल के बाहर निकलते ही उसने सोचा. पिछले कई दिनों से धूप के दर्शन नहीं हुए थे, और आज सुबह अचानक धूप निकल आई थी. दिन खुला हुआ सा लग रहा था. आज वो थोड़ा खुश भी था. खुश होने की वजह कुछ ख़ास नहीं थी. होटल में पैसे देते वक़्त जब उसने अपना वॉलट खोला तो उसे ये देखकर हलकी ख़ुशी हुई कि उसके जेब में अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. उसे याद आया कि चार दिन पहले उसने पाँच सौ रुपये एटीएम् से निकाले थे और अब भी तीन सौ रुपये बचे हुए हैं. ये ख़ुशी की बात थी. चार दिनों में मात्र दो सौ रुपये का खर्च होना…ये किसी चमत्कार से कम नहीं था. उसे याद आया कि तीन दिन जो उसके रिश्तेदार उसके साथ रुके थे, उन्होंने उसे कुछ भी खर्च करने नहीं दिया था…इसी वजह से उसके पैसे बचे रह गए थे. उसने सोचा कि जो पैसे बच गए हैं उनसे आज शाम वो कुछ अपनी पसंद की चीज़ खरीद सकेगा. वैसे यूँ अपने वॉलट में ऐसे बचे हुए पैसे को देखना उसके लिए एक हलकी सी ख़ुशी नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी ख़ुशी की बात होती थी.
दिन भर वो जाने कहाँ कहाँ घूमता रहा…छत्तरपुर का मंदिर, क़ुतुब मीनार, पंचशील मार्ग जहाँ सड़क के दोनों तरफ अलग अलग देशों के एम्बेसीज हैं और जहाँ उसे पैदल टहलना अच्छा लगता है….इंडिया गेट….जंतर मंतर और पुराना किला, जो उसके लिए बहुत ख़ास है. जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हैं इस पुराने किले से. पुराने किले के बाहर खड़े होकर वो उन सब बातो को याद करने लगता है, जो इस जगह से जुड़ी हैं. कुछ दिन याद आते हैं उसे…१० जनवरी, २ जून, ७ दिसंबर…यहाँ बिताये बहुत से खूबसूरत दिनों में से ये तीन दिन उसे याद रह गए हैं. वो किले के बाहर ही खड़ा रहता है. आमतौर पर वो किले के अन्दर जाने से बचता है. वो जानता है किले के अन्दर जाने का मतलब होगा कई सारे बातों को फिर से सोचना. वो ये नहीं चाह रहा था. वो दिन में अब और कोई भी चीज़ सोचना नहीं चाह रहा था. वो बस ये चाहता था कि  घर पहुँचने के पहले वो इतना थक जाए कि घर में जाते ही वो बस बिस्तर पर पसर जाए और एक लम्बी नींद ले सके.
शाम में जब वो थक कर घर आता तो हमेशा उसे एक अजीब सी तन्हाई पकड़ लेती…कुछ देर के लिए वो बहुत अकेला महसूस करता. ज्यादा देर नहीं, बस कुछ मिनट के लिए. यूँ भी शाम में अकेले घर में वापस आना थोड़ा तकलीफदेह होता है. जाड़ों के दिनों में अकेला घर शायद कुछ ज्यादा ही सूना सा लगता है. ख़ासकर के शाम में…एक अजीब सी गंध फैली होती है घर में, शायद तनहाई की गंध होती है वो. घर का दरवाज़ा खोलते ही वो अजीब सी गंध उसे हमेशा जकड़ लेती. वो घर का दरवाज़ा खोल कुछ देर सीढ़ियों के पास ही खड़ा रहता है. सामने कुछ लड़के दिखाई देते हैं जो अपने बालकनी  में खड़े होकर सिगरेट पी रहे होते हैं. वे पाँच लड़के हमेशा शाम में अपने बालकनी में दिख जाते हैं. उन्हें देख अकसर उसे वे दिन याद आते हैं जब वो अपने दोस्तों के साथ रहता था..वे उसके मस्ती के दिन थे. कुछ देर तक सीढ़ियों के पास खड़े रहने के बाद वो घर में दाखिल होता है. उसे पता होता है कि ये सर्दियों की शाम है. कोई और मौसम होता, गर्मियों के दिन होते तो वो खिड़की खोल कर बैठ सकता. छत पर जा सकता. अपने बालकोनी में बैठ सकता. लेकिन ये सर्दियों की शाम है…जो कि  बहुत सूनी सी, बहुत खामोश सी होती है. हर कुछ अपने जगह पर चुप…टेबल, कुर्सी, किताबें, लैपटॉप, दीवारें…सब चुप. टीवी भी तब तक चुप रहता जब तक उसे ऑन न करें. चालू  करने के बाद भी कुछ देर तक टीवी स्क्रीन पर ब्लू लाइट जलती रहती है…उसे अकसर लगता है जैसे टीवी की वो ब्लू लाइट उससे सवाल कर रही है….तुम सच में मुझे देखोगे? तुम्हारे पास कोई काम नहीं है? तुम्हारे कोई दोस्त नहीं हैं ? तुम मुझे देखते भी कहाँ हो….बस सामने बैठे रहते हो और जाने क्या सोचते रहते हो?
हर शाम का यही खेल होता है. वो टीवी के सामने बैठ जाता और अपनी आखें बंद कर लेता…टीवी से वैसे भी उसे ज्यादा मतलब कभी नहीं रहा. लेकिन इन दिनों वो टीवी भी देखने लगा है. शाम के समय वो बस इसलिए इस इडियटबॉक्स को चालू  करता है, ताकि कमरे में कुछ आवाजें मौजूद रहे..तन्हाई शायद थोड़ी कम होती है ऐसे में….
वो कुर्सी पर बैठकर अपनी आँखें बंद कर लेता है और पुराने दिनों की बहुत सारी तस्वीरें घूम जाती हैं. एक के बाद एक…किसी स्लाइड शो की तरह. उन दिनों की तस्वीरें जब वो अपने शहर में था… गांधी मैदान, अपना बाज़ार, मौर्यालोक, बोरिंग रोड, लक्ष्मी काम्प्लेक्स, अशोक थिएटर….और न जाने कौन कौन जगहें. वो सब एक एक कर के उसे याद आती जाती हैं.
फोन की घंटी अचानक बजती है.
उसकी माँ का फोन है. वो घड़ी देखता है. शाम के इस वक़्त माँ उसे फोन जरूर करती है. उसे थोड़ा अजीब लगा जब माँ ने फोन पर सीधे से पूछ लिया “तुम ठीक तो हो?”. माँ के इस बात को उसने टाल दिया. बात करते हुए वो सोचता है, माँ ये सवाल जब भी पूछती है उससे, वो हमेशा दिमागी उलझनों से घिरा रहता है. ये माँ का युज्वल सवाल नहीं होता. वो बस कभी कभी ही ये सवाल पूछती और उस समय वो सच में बहुत उदास सा होता है. शायद माँ है वो, इसलिए उसे पता चल जाता होगा कि मैं थोड़ा परेशान सा हूँ…उसने सोचा.
वो झटके से उठा…और माँ से बात करते हुए ही अपने किचन की तरफ आ गया.. चाय बनाने के लिए गैस पर बर्तन चढ़ा देता है. माँ उससे तरह तरह की बातें करती है. उसके लिए वो एक स्वेटर बुन रही होती है, वो उसे उस स्वेटर के डिजाईन के बारे में बताती है. उसे ज्यादा समझ नहीं आता लेकिन माँ की बातों को सुनना उसे अच्छा लगता है. उसने हमेशा से अपनी माँ को अपना इन्स्परेशन माना है…जाने कितने ही ऐसे बुरे फेज थे, जब माँ ने उसे विश्वास दिलाया था…कि फ़िक्र की कोई बात नहीं…सब ठीक हो जाएगा. माँ से बातें करते हुए वो बहुत हल्का महसूस करता है. सामने चाय के बर्तन में चाय उबल रही  होती  है….चाय के बर्तन से उठती भाप को वो देखता है, और उसे लगता है कि जैसे माँ से बात करते हुए उसके मन की वो उलझनें,  वो चिन्ताएं भी चाय से उठती भाप के साथ हवा में उड़ कर गायब हो रही है…
उसका मन सच में बहुत शांत सा हो जाता है. उसे याद आता है कि सुबह उसके पास पैसे बचे थे और उन पैसों से एक अच्छे डिनर की व्यस्वस्था हो सकती है. वो घर में ताला बंद कर के बाहर निकल जाता है…..सोचता है आज के दिन कम से कम कुछ पैसे खुद पर खर्च करूँगा…!

खाली डिब्बा है फ़क़त, खोला हुआ चीरा हुआ
यूँ ही दीवारों से भिड़ता हुआ, टकराता हुआ
बेवजह सड़कों पे बिखरा हुआ, फैलाया हुआ
ठोंकरे खाता हुआ खाली लुढ़कता डिब्बा

यूँ  भी होता है कोई खाली-सा बेकार-सा दिन
ऐसा बेरंग-सा बेमानी-सा बेनाम-सा दिन

[ गुलज़ार ]

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इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

6 COMMENTS

  1. बहुत सही बात कही है तुमने…फ़िक्र और चिन्ताओं को भाप में ही उड़ा देना चाहिए…। एक पुराना गाना याद आ गया…हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया…। वैसे जिस धुएँ का जिक्र गाने में है, उस धुएँ में खबरदार उड़ाया गया कुछ भी…।
    और हाँ, कुछ चीज़ें जब अपने हाथ में न हो तो उसका फ़ैसला ऊपरवाले पर छोड़ देना चाहिए…।
    पोस्ट में तीन तारीखें…२ जून, १० जनवरी और ७ दिसम्बर…बताती हैं कि ये दिन उस लड़के की ज़िन्दगी में कितने खास रहे होंगे…। तारीखों से ही तो तवारीख बनती है…है न…?
    तमाम नाउम्मीदों के ज़िक्र के बावजूद लड़का किसी कीमत पर हारेगा नहीं, ये तो तय है…। हारना चाहिए भी नहीं कभी…। आसपास तन्हाई की गंध फैली हो…तब भी नहीं…।
    दिल से लिखी गई एक खूबसूरत पोस्ट…एक बार फिर…। यूँ ही लिखते रहो…:)

  2. एक खाली सा दिन न जाने कितनी ही सोच कि कल्पनाओं में घिरा हुआ बस बितता जाता हैं…

  3. पूरी पोस्ट को पढ़ते हुए एक अजीब सा ख़ौफ़ पसरता चला गया दिलोदिमाग़ में… सिर्फ़ माँ ही नहीं, कभी-कभी बहुत चाहने वाले भी 'बिन चिट्ठी बिन तार' उस दुख से बात कर लेते हैं जो बयान नहीं किया गया. कुछ-कुछ जो कहा नहीं वो सुनते हुए और जो सुना नहीं वो कहते हुए भी.. मैं भी पिछले कुछ महीने से उस लड़के के लिए बहुत परेशान हूँ.. कुछ करीबी लोगों से ज़िक्र भी किया.. लेकिन जब बेटे का जूता बाप के पैर से भी बड़ा हो जाए, तो डर लगता है कुछ कहते हुए भी..
    गुलज़ार साहब की यह नज़्म एक बार मैंने भी कोट की थी.. लेकिन आज बशीर साहब का कलाम दोहराने का जी चाह रहा है.. कभी मिल जाए वो शख्स तो उसे कहना किमैं आज भी उसे बहुत चाहता हूँ, उसकी फ़िक्र है मुझे..

    यूँ ही बेसबब न फिरा करो, कोई शाम घर में भी रहा करो
    वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके चुपके पढ़ा करो

    कोई हाथ भी न मिलाएगा, जो गले मिलोगे तपाक से
    ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

    अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा
    तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया, उसे भूलने की दुआ करो

    मुझे इश्तहार सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ
    जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

    ये ख़िज़ा की ज़र्द-सी शाम में, जो उदास पेड़ के पास है
    ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आंसुओं से हरा करो

    नहीं बेहिजाब वो चाँद सा कि नज़र का कोई असर नहीं
    उसे इतनी गर्मी-ए-शौक़ से बड़ी देर तक न तका करो

    जीते रहो!!

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