चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है

इतवार का दिन शायद यादों का दिन होता है..वरना सुबह से तुम्हारी बातें एक के बाद एक यूँ याद न आती. तुमसे बातें करने को बड़ा दिल चाहा आज, लेकिन वो अब तो मुमकिन नहीं, तो तुम्हें खत लिखने ही बैठ गया. शेखर का गर्दनीबाग का वो घर भी याद आ रहा है आज जहाँ दिसंबर और जनवरी के दिनों में अक्सर हम लोग अड्डा जमाया करते थे. उसका वो इम्पोर्टेड स्टीरियो भी याद आ रहा है जो उसके भैया लन्दन से उसके लिए लेकर आये थे और जिसपर हम सब का बराबर का अधिकार था.

याद है तुम्हें कैसे हर इतवार हम शेखर के घर पर पूरा पूरा दिन बीता देते थे. हर इतवार हम सब कुछ भूल कर, इंजीनियरिंग एंट्रेंस की किताबों को एक कोने में रखकर सिर्फ मस्ती करते थे. इतवार एक पिकनिक जैसा ही तो होता था हमारा. हम फिल्मों के गाने बजाते, नाचते, गाते, अन्ताक्षरी खेलते, दोपहर को आंटी हमें बढ़िया बढ़िया पकवान बना कर खिलाती और शाम में तुम और पिया अपनी नयी नयी शरारतों से हमारा मनोरंजन करती. कुल मिलकर वो एक ऐसा दिन होता था जब शाम में हमें घर लौटने का दिल नहीं करता था.

तुम्हें उन दिनों गज़ल की बिलकुल भी समझ नहीं थी..शेखर को छोड़कर बाकी हमारे किसी दोस्त को ग़ज़ल समझ आती कहाँ थी. तुम्हारी तो जाने क्या दुश्मनी थी गजलों से…हमेशा एक ही लॉजिक होता था तुम्हारा, ‘कोई भी गाने को सुपरस्लो स्पीड में रोंदू से आवाज़ में गाओ तो हो गयी वो ग़ज़ल’. तुम्हें कितना डांटता था मैं लेकिन तुम मानती कहाँ थी. जब भी कहीं ग़ज़ल तुम सुनती बस गजलों का मजाक उडाना शुरू कर देती थी.

वो दिन तो तुम्हें याद ही होगा जब मैंने कितने प्यार से गुलाम अली की वो ग़ज़ल शेखर के स्टीरियो में बजाई थी ‘चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है’?

गुलाम अली की गाई मेरी फेवरेट ग़ज़ल धीमी धीमी आवाज़ में बज रही थी. पूरा माहौल, वो ग़ज़ल के बोल…उसका दर्द…सब कुछ अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था मुझे, पर ऐसे में तुम्हें जाने क्या हो गया था. तुम पर जैसे कोई भूत हावी हो गया था. बुरा सा, अजीब सा, कुछ-कुछ बिसूरता सा मुँह बना कर तुमनें गज़ल के बोलों के साथ अपने हाथों और चेहरे से अजीब-अजीब एक्शन करने शुरू कर दिए थे…पल भर तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया…हो क्या गया इस लड़की को…?

पर फिर जब तुम्हारे हाव भाव और गज़ल के बोलों को मिलाया तब जाकर सारी तस्वीर बिल्कुल साफ़ हो गई…अजीब सी रोनी सूरत पर अदृश्य आँसू पोंछ कर उन्हें मेरी ओर फेंकती हुई तुम अपना दिमाग़ी सन्तुलन नहीं खोई थी बल्कि मेरे इतने पसन्दीदा गज़ल की ऐसी की तैसी करने के मूड में थी…जितना मैंने तुम्हें पहले डांटा था ग़ज़लों का मजाक उड़ाने पर, तुम उन सब का बदला ले रही थी मुझसे. सच कहूँ तो तुम्हारी वो बदमाशी देख कर एक बार तो मन किया था कि तुम्हें वहीं दौड़ा-दौड़ा कर मारूँ, पर हमेशा की तरह मेरे गुस्से पर तुम्हारे लिए मेरा प्यार ही भारी पड़ गया था.

हद तो तब हो गयी थी जब तुम्हारी हरकतों को देखकर पिया और श्रुति ने भी ये अजीबोगरीब हरकतें शुरू कर दी थी. तुम्हारी दुश्मनी इस कैसेट के बाकी गजलों से नहीं थी, तुम तो बेचारे इसी एक खूबसूरत ग़ज़ल के पीछे पड़ गयी थी. ये ग़ज़ल खत्म हो भी जाती तो तुम इसे फिर से रिवाइंड करती और तुम तीनों मिलकर फिर से अजीबोगरीब मुद्राएँ बनाकर ग़ज़ल की ऐसी तैसी कर डालती.

लेकिन बात सिर्फ अजीबोगरीब एक्सन और मुद्राओं तक ही सिमित कहाँ थी. ग़ज़ल के हर शेर पर तुम्हारे एक्सपर्ट कमेन्ट भी तो मुझे सुनने को मिल रहे थे. याद है तुम्हें वो कमेंट्स?

“दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये / वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है”, को तुमनें कुछ ऐसे समझाया था मुझे, “हो सकता है कि तुम्हारे शायर साहब ने बेचारी उस लड़की का कुछ कीमती समान अपने पास रख लिया हो, वरना वो शायर कोई सलमान खान थोड़े हैं जो उनके बुलाने के लिए लड़की नंगे पाँव दौड़े दौड़े आ जायेगी”. और फिर तुम मुझे धमका के कहती “भूल जाओ साहब कि कभी मैं ऐसे कोठे पर नंगे पाँव आऊँगी..मुझसे ये सब ‘ग़ज़ली’ नौटंकियों की उम्मीद बिलकुल न करना तुम”.

‘गजली’ असल में तुम्हारा इन्वेंट किया हुआ शब्द था. चलो मान लिया कि ये शब्द तुमनें ‘फ़िल्मी’ शब्द के तर्ज पर इन्वेंट किया था.. लेकिन इस ग़ज़ल के बाकी लफ़्ज़ों का क्या कसूर था कि तुमनें उन तमाम उर्दू के शब्दों को जाने कैसे बकवास और बेतुके मानी दे दिए थे.. जैसे “देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से” को तुमनें बना दिया था, “देखना मुझको जो बर्गर का नास्ता करते हुए तो सौ सौ नाज़ से”. सच पूछो तो तुम्हारे इन्वेंट किये उन शब्दों के मानी इतने बकवास थे कि बहुत तो मुझे याद भी नहीं, और तुम बाकायदा उन अजीब मानी को अपने डायरी में नोट कर के रखती थी. मुझे आज तक समझ में ये बात नहीं आई कि तुम्हें इस बेचारी एक ग़ज़ल से इतनी नफरत आखिर हुई क्यों थी.

तुम मुझे सालों तक बस एक इसी ग़ज़ल को लेकर चिढ़ाती रही. सच बोलूं तो मैंने एक वक्त के बाद तुम्हारे सामने इस ग़ज़ल का जिक्र तक करना छोड़ दिया था..कभी तुम मुझे इरिटेट करने के लिए इस ग़ज़ल का जिक्र करती तो मैं बात किसी दुसरे टॉपिक पर मोड़ दिया करता था. नहीं, किसी चिढ़ या गुस्से से नहीं…बस यूहीं…

फिर बहुत सालों बाद जनवरी का वो दिन आया. जब तुम्हारे और मेरे सबसे बुरे दिन चल रहे थे. जब ये बात लगभग पक्की थी कि तुम अब कभी वापस नहीं आओगी और जब मैं खुद को ये समझा रहा था कि बाकी की ज़िन्दगी मुझे तुम्हारे बगैर ही काटनी है.इतवार का ही दिन था वो भी जब मैं शहर के उसी कैफे में बैठा हुआ था जो तुम्हारा और मेरा पसंदीदा कैफे था. ये जानते हुए भी कि हमारा और तुम्हारा साथ अपने अंतिम पड़ाव पर था, और कुछ ही दिनों में तुम एक अलग सफ़र पर निकल जाओगी, मैं बहुत पीछे छुट जाऊँगा… ये जानते हुए भी कि सभी दरवाज़े बंद हो गए हैं. फिर भी उस दिन कैफे में बैठे जाने मैं कौन से रास्ते तलाश कर रहा था, कि कहीं से तो कोई उम्मीद दिखे, कहीं से तो कोई राह निकले जिसपर चलकर तुम्हें मैं वापस अपनी ज़िन्दगी में ला सकूँ. लेकिन ये मैं भी जानता था और तुम भी कि सभी रास्ते, सभी दरवाज़े बंद थे.

ऐसे में तुम्हारा उस दिन फोन करना मुझे चौंका गया था. सच कहूँ तो तुम्हारे उस फोन की मुझे उम्मीद बिलकुल नहीं थी. बेहद कांपती आवाज़ में तुमनें कहा था, “मै सोना चाहती हूँ…लेकिन सो नहीं पा रही हूँ..बहुत बेचैनी सी, बहुत अकेलापन सा लग रहा है…”

पहले का कोई दिन होता तो मैं तुम्हें मजाक में कह देता “सोना तो है नहीं मेरे पास, चाँदी से काम चला लो” और तुम खिलखिलाकर हँस देती. लेकिन उस दिन मैं एकदम खामोश रहा. मैं तो ये सवाल भी नहीं पूछ सकता था कि तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही, बेचैनी और अकेलापन सा क्यों लग रहा है.

“तुम सुन रहे हो?” मेरी चुप्पी को सुनकर तुमने मुझसे पूछा था.
“हाँ, बोलो न..मैं सुन रहा हूँ..” मैंने कहा था.
“सुनों, अब मैं सब समझती हूँ..मुझे पता है वो क्या कहती है? मैं सब जानती हूँ अब..” तुमनें कांपती हुई आवाज़ में कहा था.
“क्या बोल रही हो तुम? क्या समझती हो? क्या जानती हो?” मैंने तुमसे पूछा था. मुझे एक पल लगा था कि तुम फिर नींद में मुझसे बात कर रही हो. लेकिन ऐसा नहीं था.
“वो ग़ज़ल..याद है तुम्हें? वो ग़ज़ल? चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना? मैं अब समझ गयी हूँ. बहुत पहले समझ गयी थी. तुम्हें बस बताया नहीं था.” तुमनें सिसकती आवाज़ में कहा था.

इधर मैं एकदम चुप था. तुमसे क्या कहूँ ये समझ नहीं पा रहा था.

कुछ देर तुम एकदम चुप रही. फिर तुम्हारी वही सिसकती की आवाज़ मुझे सुनाई दी..इस बार लेकिन सिसकते हुए तुम उस ग़ज़ल को धीरे धीरे गुनगुना रही थी..पूरी की पूरी ग़ज़ल तुम्हें याद थी, ये मैं नहीं जानता था. हर बार तुम बस एक लाइन पर आकर रुक जा रही थी “वो तेरा रो रो के मुझको भी रुलाना याद है…हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है…”

इधर शहर के इस कॉफ़ी हाउस में जहाँ इतनी भीड़ थी, मैं बेचैन हो उठा था. तुम्हारी सिसकने की आवाज़ और इस ग़ज़ल के बोल मेरे सीने के जैसे आर पार हो रही थी. सिसकने की आवाज़ ऐसे भी बहुत भयानक होती है. तब और भी ज्यादा जब वो आपके किसी अपने की आवाज़ हो…और बेचैनी अपने चरम पर तब पहुँच जाती है जब आप सिर्फ आवाज़ सुन रहे हैं और उसे देख नहीं पा रहे हों. मैं जानता था कि उस समय मैं ऐसा कुछ भी नहीं कह सकता था या कर सकता था जिससे तुम चुप हो सको. उस समय सारे शब्दों ने मुझे दगा दे दिया था. कहता भी क्या मैं तुमसे? बस तुम्हारे साथ अन्दर ही अन्दर मैं भी सिसकता रहा..बेचैन होता रहा. भगवान ही जानता है कितनी शिद्दत से मैंने उस वक़्त चाहा था कि काश तुम मेरे पास होती तो तुम्हें अपनी बाहों में भर लेता और कहता कि तुम उदास मत हो, मैं सब ठीक कर दूंगा. लेकिन ना तो उस वक़्त मैं तुम्हें बाहों में भर सकता था और ना तो चाह कर भी तुम्हें ये कह सकता था कि मैं सब ठीक कर दूंगा. कितना हारा हुआ कितना बेबस महसूस कर रहा था मैं उस वक़्त. खुद से बेइन्तेहां नफरत भी होने लगी थी मुझे.

तुम जानती हो, तुमसे कभी कहा नहीं मैंने. लेकिन बहुत दिन तक तुम्हारी वो बातें, तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती रही हैं…आज भी तुम्हारी वो सिसकियाँ मुझे हांट करती हैं. आज भी जाने क्यों आधी रात को मैं चौंक कर जाग जाता हूँ.. लगता है तुम मेरे बिलकुल पास बैठी हो, और ये ग़ज़ल गुनगुना रही हो. उस समय मैं जाने क्यों बेहद डर जाता हूँ..तुम्हें बेहद याद करता हूँ उस समय..मैं जानता हूँ कि अब ये ग़ज़ल मुझे सारी ज़िन्दगी हांट करेगी, ऐसे ही मुझे डराएगी और तुम्हारी याद दिलाएगी..

चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है,
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है,

तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा,
और तेरा दाँतों में वो उँगली दबाना याद है,

खींच लेना वो मेरा पर्दे का कोना दफ़्फ़ातन,
और दुपट्टे से तेरा वो मुँह छिपाना याद है,

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़,
वो तेरा रो-रो के मुझको भी रुलाना याद है,

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिये,
वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है,

देखना मुझको जो बर्गश्ता तो सौ सौ नाज़ से,
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है,

चोरी चोरी हम से तुम आकर मिले थे जिस जगह,
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है,

बेरुख़ी के साथ सुनाना दर्द-ए-दिल की दास्तां,
और तेरा हाथों में वो कंगन घुमाना याद है,

वक़्त-ए-रुख़सत अलविदा का लफ़्ज़ कहने के लिये,
वो तेरे सूखे लबों का थरथराना याद है,

बावजूद-ए-इद्दा-ए-इत्तक़ा ‘हसरत’ मुझे,
आज तक अहद-ए-हवस का ये फ़साना याद है,

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

4 COMMENTS

  1. दिल से लिखा हुआ बहुत सालों बाद पढ़ा है मैंने, खुश नही हूँ बस असमंजस में हूँ की कितना कुछ छूट जाता है एक अज़ीज के दूर होजाने से…

  2. Speechlessness witnessed! I just want to say one thing Bhaiya, your words have the power to make the reader imagine the entire story as if he himself is a part of the story and he also feels the same way. You have given this song a whole new meaning to me! And thank you so much for that Bhaiya!!!

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