याद है तुम्हें उन्नीस सौ अट्ठानवे का वो सर्द दिसम्बर?

याद है तुम्हें 1998 का वो सर्द दिसम्बर? - Love In December a romantic story by abhishekतुम होती यहाँ इन दिनों तो खूब खुश होती. एकदम तुम्हारे टाइप की ठंड पड़ रही है आज कल, जैसा दिसम्बर तुम्हें पसंद है, वैसा ही इस साल है. ख़बरें हैं कि सालों बाद दिसम्बर इस कदर सर्द है. कल ही अख़बार में पढ़ा था कि उन्नीस सौ अट्ठानवे के बाद पहली बार शहर में इतनी ठण्ड पड़ रही है.

याद है तुम्हें 1998 का वो सर्द दिसम्बर? अरे वही ‘कुछ कुछ होता है’ वाली दिसम्बर? पहली बार तुमसे भी उसी साल मुलाकात हुई थी न. वे गर्मियों के दिन थे जब हम मिले थे, और दिसम्बर तक तो तुम्हें मुझपर हुक्म चलाने की आदत सी पड़ गयी थी. हम दोनों ने दसवीं का इम्तेहान दिया था, और ग्यारहवीं की पढ़ाई चल रही थी.

वैसे पढाई क्या पढ़ रहे थे, बेसिकली उस साल हम और तुम शहर की सड़कों पर आवारागर्दी करते थे. उस साल अक्टूबर से ही सर्दियाँ शुरू हो गयी थी और दिसम्बर आते आते तो सर्दियों ने कहर बरपा दिया था.  तुम्हारी वो अजीब सी लॉजिक उन सर्दियों में मुझे स्टुपिड सी लगती थी, कि दिसम्बर के महीने में पढाई करना गुनाह है, इस महीने तो सिर्फ इश्क किया जा सकता है, कोहरे लगी सड़कों पर हाथों में हाथ डाल कर घूमा जा सकता है, और फिर सर्द रातों में लिहाफ ओढ़ कर रोमांटिक नावेल पढ़ा जा सकता है.

उन दिनों मुझे लगता था, कि दसवीं में तो जैसे तैसे कर के अच्छे अंकों से पास हो गया हूँ, लेकिन तुम्हारे ऐसे ही अजीब लॉजिक रहे और मैं तुम्हारे साथ यूँ ही घूमता रहा तो बारहवीं के लक्षण ठीक नहीं हैं. पढाई न तुम खुद करती थी और न मुझे करने देती थी. पूरे पूरे दिन हम शहर घूमते थे.

वो दिसम्बर का ही कोई दिन रहा होगा, जब शहर में बर्फीली हवाएं चल रही थी. कोहरा ऐसा कि खिड़की से कुछ भी दीखता नहीं था. और ऐसे में ही तुमनें फिल्म देखने का प्लान बना लिया था.

मैं कभी नहीं भूल सकता उस दिन को. तुम्हारे शब्दों में कहूँ तो मैंने तुम्हारे कीमती दिसम्बर का वो एक दिन बर्बाद कर दिया था. खूब कोसा था तुमने मुझे.

‘यार सिर्फ इकत्तीस दिन तो मिलते हैं दिसम्बर में, उसमें भी तुमनें एक दिन मेरा बर्बाद कर दिया’, तुमने गुस्से में मुझसे कहा था.

पर देखो, तुम्हारे कीमती दिसम्बर का वो एक दिन बर्बाद करने का मेरा कोई इरादा नहीं था, और ना ही तो मेरी कोई गलती थी. तुमने तो बस पिछली शाम इतना बताया था कि फिल्म देखनी है, कौन सी फिल्म यह तो तुमनें बताया नहीं था. मैंने कॉमन सेन्स का इस्तेमाल करते हुए ताजा रिलीज़ अजय देवगन की ‘ज़ख्म’ का टिकट खरीद लिया था. बाजू के हॉल में ही ‘कुछ कुछ होता है’ भी लगी थी जो पिछले एक महीने में तुमने तीन चार बार देख लिया था. तो मैंने वही फैसला किया जो कोई भी समझदार इंसान करता. देखी हुई फिल्म क्यों देखना, नई रिलीज़ देखते हैं.

लेकिन तुम तो इस छोटी सी बात पर ज्वालामुखी बनी बैठी थी. नाराज़ इतनी थी कि तीस रुपये में खरीदी रेजेंट की दो बालकनी का टिकट तुम्हारे हाथों बस फटते फटते रह गया था.

पूरे फिल्म के दौरान तुम मुझे मेरे इस ‘गुनाह’ के लिए धमकाती रही थी. फिल्म खत्म होने के बाद मेरे कॉलर को पकड़ते हुए तुमने कहा था, ‘शुक्र करो गली में आज चाँद खिला वाला गाना था, वरना तो तुम्हारी हरकत ऐसी थी कि गली में चाँद खिले या न खिले, तुम्हारे सिर पर चाँद जरूर खिल जाता. सामने रखा गमला देख रहे हो न? और अपना सिर…बाकी तुम खुद ही समझदार हो.”

वाट लगा देती थी मेरी तुम जब ऐसे गुस्से वाले मोड में आती थी. बड़ा मुश्किल होता था तुम्हारे गुस्से को शांत करवाना. तुम्हें गुस्से वाले मोड से बाहर निकालने के लिए शालीमार का चाट और वंडरलैंड की हॉट चोकलेट खिलाना कम्पलसरी था.

उस शाम भी तुम्हारे गुस्से को शांत करवाने के चक्कर में घर लौटते हुए काफी देर हो गयी थी. तुम्हारे और मेरे घर का सीन थोड़ा अलग था. तुम जितनी भी देर से लौटो, तुम्हें घर में कभी डांट तो पड़ती नहीं थी. लेकिन मेरे घर का हाल थोड़ा उल्टा था. कंपकपाती ठण्ड में पापा बरामदे में ही खड़े हो कर मेरा इंतजार कर रहे थे.

उनका चेहरा देख कर समझ गया था कि आज शामत आने वाली है. और हुआ भी कुछ ऐसा ही. आधे घंटे तक पापा का गुस्सा मुझपर निकलता रहा, और मैं मन ही मन तुम्हें कोसता रहा था.

रात के खाने में माँ ने बड़ी अच्छी गोभी, मटर, टमाटर की सब्जी और मेथी के पराठे बनाये थे, लेकिन पापा की डांट से ही मेरा पेट भर चुका था.

उस रात तो तुम्हें पूरे जी भर कोसा था मैंने. तुम्हारी वजह से ही तो पापा की  फटकार पड़ी थी और माँ के हाथ का बना इतना बढिया खाना बेस्वाद लगने लगा था. रात को कमरे में जाने से पहले पापा ने अगले दिन के लिए चेतावनी भी दे दिया था, ‘अख़बार में खबर आई है कि कल बारिश होगी और शीतलहरी चलेगी, बाहर निकलने की कोई जरूरत नहीं है, घर में ही रहना.’

पापा ने चेतावनी दे तो रखा था, लेकिन तुम पर मुझे पूरा यकीन भी था. ठण्ड के मौसम में तुम्हारे साथ घूमने के चक्कर में पापा चाहे मेरी पिटाई डंडे से ही क्यों न कर दें, तुम्हें घंटा कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. तुम्हें तो बस सर्दियों में मेरे साथ घूमने से मतलब था.

रात सही में ठण्ड बढ़ी हुई थी. सुबह देर तक मैं सोते रह गया था, रजाई से बाहर निकलने की इच्छा नहीं हो रही थी. माँ की आवाज़ से ही मेरी आँख खुली. मेरे कमरे में आकर माँ ने भी हिदायत दे दी, ‘बेटा आज बड़ी ठण्ड पड़ रही है. रजाई में ही घुसे रहो’.

यार जाड़े के मौसम में रजाई की गर्माहट से निकलने का मन किसे करता है? इंसानों को तो नहीं, लेकिन हाँ तुम्हारे जैसे एलियन हों तो उन्हें जरूर रजाई की गरमाई से बेहतर सड़कों की ठिठुरती ठंड लगती है.

बे मन से खुद को रजाई से अलग किया. खिड़की के बाहर झाँका तो बारिश अब भी हो रही थी. माँ आँगन में अलाव जलाने के लिए सुबह से ही लकड़ियाँ जुटा रही थी.

घर के लैंडलाइन पर ठीक ग्यारह बजे तुम्हारा कॉल आता था उन दिनों. उस कड़कती ठंड में भी मैं तय समय पर तैयार होकर तुम्हारे कॉल के इंतजार में  टेलीफोन के पास बैठा अखबार पढ़ रहा था.

सामने की कुर्सी पर पापा बैठे थे. बड़े खुश दिखाई दे रहे थे वो. कल की नाराजगी उनके चेहरे से गायब हो चुकी थी. वो मजे से चूरा-दूध, गुड़ और तिलकुट का नाश्ता कर रहे थे.

जब साढ़े ग्यारह तक तुम्हारा कॉल नहीं आया, तो मैं खुश हो गया, कि चलो आज बाहर नहीं निकलना है. पापा की डांट आज नहीं पड़ेगी.

सोच ही रहा था कि फिर से खुद को रजाई के हवाले कर दूँ, कि तभी फोन की घंटी बजी.

तुम्हारा ही कॉल था.

जैसा कि आम तौर पर होता है, तुम अक्सर गुस्से भरे आवाज़ में मुझे फरमान जारी कर दिया करती थी मिलने का, इस बार उससे उलट तुम्हारी आवाज़ चाशनी में डूबी हुई सी थी.

‘सुनो न, कल के लिए मुझे माफ़ करो न..’

तुमने इतने स्वीटली माफ़ी माँगा था, कि पत्थर का भी दिल पिघल जाए. मेरा दिल तो खैर पहले से पिघला हुआ था. मैं तुम पर गुस्सा होने के बजाये तुम्हें ही समझाने लगा था-

‘अरे तुम्हारी नहीं, कल सारी गलती मेरी थी.. आई एम सॉरी…’

‘हम्म…चलो तुम्हें अपनी गलती का  एहसास हुआ, यू आर forgiven’!

तुमनें फिर से मीठी आवाज़ में कहा था, और उसी मीठी आवाज़ में एक हिदायत भी दे दी थी,  ‘ऐसी हरकत दोबारा नहीं करना? और आज मिलोगे न? प्लिज्ज्ज़….’

अब याद करता हूँ तो उस कॉल के तुम्हारे खेल समझ आते हैं. तुमनें मेरे से सॉरी भी बुलवा लिया था और तुम्हारे उस लम्बे से ‘प्लीज़’ में इतनी मिठास थी कि बारिश और पापा के डांट की परवाह किये बगैर मैं तुमसे शाम में मिलने के लिए राजी भी हो गया था.

वो इतवार का दिन था और अगर दिल की बात कहूँ तो उस दिन तुमसे मिलने आने का ज़रा भी मन नहीं था. वो तो तुम्हारी एक्स्ट्रा मीठी आवाज़ ने फंसा लिया था मुझे, वरना सुबह से ही घर में अलाव जल रहा था.  दोपहर बाद से ही माँ लिट्टी-चोखा और टमाटर की चटनी की तैयारियों में जुटी हुई थी. सब लोग आँगन में आग के पास बैठकर गर्म-गर्म लिट्टी चोखे का आनंद लेने का प्लान बनाये हुए थे. बहनों ने पढ़ाई खत्म कर के रजाई में घुस कर लूडो और व्यापारी खेलने का प्लान बनाया था और शाम में दूरदर्शन पर अमिताभ और शशि कपूर की ‘त्रिशूल’ आने वाली थी.’

इन सब को छोड़कर तुम्हारे साथ दिसम्बर की ठण्ड में भीगते हुए टहलने का प्लान मुझे ज़रा भी रुचिकर नहीं लग रहा था. लेकिन दिसम्बर और तुम्हारी जिद के सामने मैं चाह कर भी ज्यादा कुछ कर नहीं सकता था.

शाम में मुझे तैयार होते देख पापा ने शुरू में तो डांटा, लेकिन मैंने पढ़ाई और कोचिंग क्लास्सेज का ऐसा बहाना बनाया कि पापा ज्यादा कुछ कह नहीं सके.

हाँ बस घर से निकलते वक़्त पापा ने जबरदस्ती मेरी स्टाइलिश लेदर जैकेट और लेदर ग्लव्स को उतरवा कर लहासा मार्किट से खरीदी गर्म उनी जैकेट और मोटे उनी दस्ताने, गले में मफलर और मंकी कैप डलवा दिया था और मेरी एलएमएल वेस्पा की चाभी छीन साइकिल से कोचिंग जाने को कहा था, क्यूंकि उनके मुताबिक साइकिल पर स्कूटर के मुकाबले कम ठंड लगती.

उस वेशभूषा में मैं पूरा का पूरा बुजुर्ग लग रहा था. वैसे मैंने सोचा तो था कि घर से थोडा दूर जाकर कम से कम मंकी कैप और वे बेढब दस्ताने उतार दूँगा, लेकिन बारिश के बाद हड्डियाँ जमा देने वाली हवा चल रही थी और ऐसे में टोपी और दस्ताने की गर्माहट मुझे अच्छी लगने लगी थी.

ख्याल तो आया था कि तुम ऐसे मुझे देखोगी तो जाने कैसे रियेक्ट करोगी, लेकिन कौन-सा मुझे तुम्हें इम्प्रेस करना था कि मैं उस ठण्ड में तुम्हारे पास ‘कुछ कुछ होता है’ का शाहरुख खान बन के आता.

तुम्हारे से ज्यादा उस शाम मुझे फ़िक्र थी उन चीज़ों की, जो तुमने मुझे दिए थे और अचानक से मँगवा लिया था. उन चीज़ों में कुछ किताबें, मैगजीन्स, टेट्रिस वाला विडियो गेम, और कुछ ऑडियो कैसेट थे.

‘इजाजत’ के ‘माया’ की तरह तुमने फोन पर कहा था मुझे,  ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है,  वो भिजवा दो’. सच कहूँ, तो तुम्हारे ‘वे सामान’  उन दिनों मेरी बहुत मदद कर रहे थे,  और उन्हें लौटने का मेरा ज़रा भी मन नहीं कर रहा था.

एक तो तुमने न कभी किताबें-मैगजीन्स खरीदी और न कैसेट खरीदती थी और दूसरा कि मेरे पॉकेटमनी से जबरदस्ती अपने लिए अपनी पसंद की किताबें और कैसेट्स खरीदवाती थी, जिसे गाहे बगाहे मुझे देकर मुझ पर ‘एहसान’ भी कर दिया करती थी.

मैगजीन्स और कैसेट्स के कीमतों का अंदाज़ा भी था तुम्हें उन दिनों? स्टारडस्ट जो तुम बस उसके पोस्टर्स के लालच में मुझसे खरीदवाती थी, उसकी कीमत बढ़ कर तीस रुपये हो गए थे और एचएमवी, सोनी म्यूजिक वालों ने भी कैसेट के दाम बढ़ा कर पैतीस और चालीस रुपये कर दिए थे. तुम्हारे चक्कर में  पॉकेटमनी कब हवा हो जाती थी पता ही नहीं चलता था, और मुझे पॉकेटमनी के कमी को कम्पेशनेट करने के लिए हर दिन माँ जो सब्जी खरीदने के लिए पैसे देती थी उसमें हेरा फेरी करना पड़ता था.

और तुम बेरहम ऐसी कि हुक्म जारी कर दिया था कि मुझे मेरे सामान वापस कर दो.

कितने बुझे हुए मन से उस शाम मैं तुमसे मिलने आ रहा था, कुछ अंदाज़ा भी था तुम्हें? ऐसा लग रहा था मानो दुनिया उजड़ रही हो अपनी. अब शाम किसके सहारे कटेगी? यही सोच रहा था मैं भारी मन से साइकिल का पैडल मारते हुए.

और तुम? तुम तो खड़ी थी पूरे टसन में कंप्यूटर कोचिंग क्लास के सामने वाली गली में चाचा के चाय दूकान के पास. बाँस वाले खम्बे को बड़े स्टाइल में पकड़े हुए, सर से लेकर पाँव तक प्रीती जिंटा बन कर, अपने सामान के इंतजार में खड़ी थी तुम.

एक फिल्म आई थी न उन दिनों प्रीती की, एकदम उसी से इंस्पायर्ड तुम ऊपर से नीचे तक ब्लैक में थी. ब्लैक कैप, ब्लैक जीन्स और ब्लैक लेदर जैकेट और बूट्स.

और मैं? मैं तो खैर हर एंगल से बुजुर्ग लग रहा था. उसका सबूत तुमनें ही दिया था मुझे, जब मुझे सामने देखकर तुमनें पूछा था, ‘और अंकल, क्या हाल चाल? इतनी ठण्ड लग रही है आपको? मरे नहीं? जिंदा हो?’.

कायदे से तो गुस्से में मेरा चेहरा लाल हो जाना चाहिए था, और तुम्हारे सामानों से भरे बैग को वहीँ तुम्हारे सामने पटकते हुए कहना चाहिए था – ये लो सम्भालों अपनी अमानत.

लेकिन यार, तुम उस शाम इतनी प्यारी लग रही थी कि मैं चाह कर भी तुमपर बिगड़ न सका. इतवार को यूँ तुमने मिलने बुला लिया था, इस बात का इरिटेसन तो तुम्हें देखते ही हवा हो चुका था.

बहुत ज्यादा खुश थी तुम उस शाम. जाने क्या बात थी? शायद अपने कैसेट और सामान को वापस पा कर खुश थी तुम या दिसम्बर में शहर शिमला हो गया था, इस वजह से खुश थी या कोई दूसरी वजह रही हो तुम्हारे खुश होने की. लेकिन तुम्हें यूँ मुस्कुराता देख मैं अच्छा महसूस कर रहा था.

हम और तुम दिसम्बर की उस सर्द शाम, उस चाय दूकान की लकड़ी वाली बेंच पर पास पास बैठ कर चाय पी रहे थे. तुमने चाय पीते हुए मुझसे यूँ मिलने आने की जिद की वजह बताई थी. वो वजह बेहद मासूम थी.

तुमने कहा था, ‘देखो यार तुम्हारे अलावा मेरे दो ही सबसे प्यारे दोस्त हैं, बारिश और दिसम्बर. अब जब दो दोस्त एक साथ आ जाए,  मतलब दिसम्बर में बारिश तो तीसरे को बुलाना लाजमी है न’.

और फिर तुमनें मेरे बाँहों में अपना सिर छुपा कर बच्चों सी आवाज़ में मुझसे कहा था, गुस्सा तो नहीं हो न तुम?’

और मैंने जवाब में मुस्कुराते हुए तुम्हारे गालों को सहला दिया था.

उस शाम मैं तुमसे कहना चाहता था कि तुमने मेरा इतवार बर्बाद नहीं किया, बल्कि शाम को और हसीं बना दिया है. लेकिन चाह कर भी मैं तुमसे ये बात कह नहीं सका.

बहुत देर तक हम दोनों उस चाय दूकान पर बैठे रहे थे. तुम चाय वाले चाचा से गर्मागर्म पकौड़ियाँ छनवाती रही थी और हम एक के बाद एक चाय पीते रहे थे.

तुम पूरे तन्मयता से अपने पुराने क्रिसमस के दिनों की कहानियां सुनाने लगी थी – जब तुम छोटी थी और तुम्हारी दीदी इसी महीने विदेश से आती थी, तुम सब मिलकर क्रिसमस ट्री सजाती थी, और रात में चॉकलेट केक खाती थी.

तुम्हारी बातों और यादों की गर्माहट ने मुझे किसी और दुनिया में पहुँचा दिया था. न मुझे समय की फ़िक्र हो रही थी, और ना ही उस ठिठुरती सर्द शाम मुझे सर्दी लग रही थी. मैं बस चाह रहा था कि वक़्त ठहर जाए और हम दोनों यूहीं बैठे बाते करते रहे.

अगर चाय वाले चचा ने समय का याद न दिलाया होता तो हम शायद और भी बहुर देर तक वहीँ बैठे रहते.

तुम उस शाम वापस लौटना नहीं चाहती थी. लेकिन फिर भी हमें वहाँ से उठना पड़ा था, और मैंने तुमसे वादा किया था कि कभी तुम्हारे लिए मैं हर साल क्रिसमस ट्री गिफ्ट करूँगा.

लेकिन उस शाम मैं ये नहीं जानता था कि तुमसे किया वो वादा मैं पूरा नहीं कर पाऊंगा.

उस दिसम्बर को बीते कितने साल हुए लेकिन अब भी उस शाम को याद करता हूँ तो पूरे बदन में हलकी सिहरन सी उठ जाती है. चेहरे पर मुस्कराहट तैर जाती है और आँखें थोड़ी भीग सी जाती है. बहुत याद आता है दिसम्बर का वो खुबसूरत दिन, और बहुत याद आती हो तुम!

Abhihttps://www.abhiwebcafe.com
इस असाधारण सी दुनिया में एक बेहद साधारण सा व्यक्ति हूँ. बस कुछ सपने के पीछे भाग रहा हूँ, देखता हूँ कब पूरे होते हैं वो...होते भी हैं या नहीं! पेशे से वेब और कंटेंट डेवलपर, और ऑनलाइन मार्केटर हूँ. प्यारी मीठी कहानियाँ लिखना शौक है.

4 COMMENTS

  1. पढ़ तो उसी दिन लिए थे. ये बताना भूल गए कि पढ़ ली है   आज एक फोटो पर नजर पढ़ी तो याद आया. सच दिसंबर इश्क का महीना होता है…कई बार दिसंबर जनवरी तक चला आता है..और मेरे जैसा आदमी भी जनवरी में ये गुनगुनाता है..
    ‘फिर से इश्क करने को जी चाहता है.
    एक बार फिर से उससे मिलने को दिल चाहता है.’
    [ पिछले शनि को कॉफ़ी होम में मैं ये गुनगुना रहा था.]
    सोचा था कि फुरसत में पढूंगा लेकिन फिर रहा नहीं गया…काम को परे रख पढ़ने लगा. पढ़ते पढ़ते दिसंबर की सर्दी को महसूस करने लगा..पुराने दिन याद आने लगे. उसमें मैं डूबकी लगाने लगे. कहानी आपकी थी लेकिन मैं उसे महसूस करने लगा.
    दरअसल आप लिखकर उस समय को बार-बार भरपूर जी लेना चाहते हैं. जिसे जीने का आपका मन है. और जब आप ऐसे करते हैं तो समझिए आप सच में जी रहे हैं. उस प्यार के गहरे में जाकर आप उस आत्मा को छूने की कोशिश कर रहे हैं जिसे आप देख नहीं पाते बस महसूस कर पाते हैं…ऐसे ही महसूस करते रहिए और यूं ही लिखते रहिए..
    जाते-जाते.
    “मेरे कमरे में आकर माँ ने भी हिदायत दे दी, ‘बेटा आज बड़ी ठण्ड पड़ रही है. रजाई में ही घुसे रहो”
    बस यहाँ माँ का ये डायलॉग उस ‘तुम’ के मुंह से कहलवाना था…मेरा आनंद दो गुना हो जाता  

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